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भारत के करीब आ रहा तालिबान, अफगानिस्तान की सीमा पर भारतीय कंपनी बनाएंगी लैबोरेटरी

डेस्क: भारत और तालिबान (India and Taliban) के रिश्ते लगातार अच्छे हो रहे हैं. तालिबान ने बुधवार को एक भारतीय कंपनी के साथ 46.3 मिलियन डॉलर का एक कॉन्ट्रैक्ट साइन किया. इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत अफगानिस्तान (Afghanistan) के मुख्य बॉर्डर क्रॉसिंग और काबुल में एडवांस्ड लैबोरेटरी कॉम्प्लेक्स बनाए और इक्विप किए जाएंगे. यह समझौता अफगानिस्तान स्टैंडर्ड्स एंड क्वालिटी अथॉरिटी और भारतीय कंपनी TCRC के बीच साइन किया गया. इस समारोह में तालिबान के आर्थिक मामलों के उप-प्रधानमंत्री अब्दुल गनी बरादर भी मौजूद थे.
तालिबान अधिकारियों के मुताबिक यह पांच साल का कॉन्ट्रैक्ट काबुल और देश भर के नौ बॉर्डर पोर्ट्स पर लैबोरेटरी सुविधाओं के निर्माण और उन्हें इक्विप करने से जुड़ा है. ये डील ऐसे समय पर हुई है जब तालिबान ने पाकिस्तान के साथ बोर्डर बंद कर रखा है और लगातार अपनी सीमा की सुरक्षा बढ़ा रहा है. तालिबान की स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी के प्रमुख फैजुल्ला तमीम ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में ऐसी लैबोरेटरीज़ शामिल हैं जो निर्माण सामग्री, बिजली के उपकरणों और टेक्सटाइल, चमड़े और कागज से जुड़े प्रोडक्ट की टेस्टिंग पर फोकस करेंगी.

भारतीय कंपनी करेगी अफगान सीमा को सुरक्षित
फैजुल्ला तमीम ने कहा कि यह कंपनी एडवांस्ड लैबोरेटरी उपकरण भी लगाएगी, मौजूदा टेस्टिंग सिस्टम को ठीक करेगी और अफगान कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने में मदद के लिए विदेशी विशेषज्ञों को भी लाएगी. इस समझौते के तहत अथॉरिटी के तकनीकी कर्मचारियों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह के ट्रेनिंग प्रोग्राम मिलने की उम्मीद है.
तमीम ने यह भी कहा कि इस प्रोजेक्ट में इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर स्टैंडर्डाइजेशन (जिसे ISO के नाम से जाना जाता है) से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सर्टिफिकेशन हासिल करने के प्रयास भी शामिल हैं. उन्होंने इस समझौते को प्रोडक्ट्स की क्वालिटी कंट्रोल में सुधार करने, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और अफगानिस्तान में घटिया सामान के आयात को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया.
पाकिस्तान से तनाव के बीच हुआ समझौता
यह ऐसे समय में हुआ है जब तालिबान और पाकिस्तानी सेना के बीच सीमा पर हुई झड़पों के बाद पाकिस्तान के साथ बॉर्डर क्रॉसिंग बंद पड़े हैं. वर्ल्ड फूड प्रोग्राम ने कहा है कि बॉर्डर के लगातार बंद रहने से खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें बढ़ी हैं और अफगान परिवारों पर दबाव भी बढ़ा है.

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