रवीन्द्र जयंती के अवसर पर आयोजित पेंटिंग एवं पोस्टर प्रतियोगिता में रुबीना-प्रथम, अन्नया-द्वितीय एवं शैलजा ने पाया तृतीय स्थान

दरभंगा : गीतांजलि का मुख्य विचार रहस्यवाद है जो कई अन्य विचारों को भी जन्म देता है। भारतीय दर्शन के अनुसार रहस्यवाद वह उच्चतम अवस्था है, जहाँ मनुष्य की आत्मा ईश्वर से प्रत्यक्ष संपर्क में होती है। एक रहस्यवादी का मानना है कि जो संसार हम अपनी आँखों और कानों से देखते और सुनते हैं, वह वास्तविक नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक अधिक वास्तविक संसार है, जिसे केवल आध्यात्मिक रूप से ही समझा जा सकता है, इन्द्रियों के माध्यम से नहीं। रहस्यवादी प्रत्यक्ष और सहज ज्ञान के माध्यम से आंतरिक, परम वास्तविकता से संपर्क स्थापित करने का प्रयास करता है। कुछ मायनों में, यथार्थवाद और सामान्य ज्ञान रहस्यवाद के विपरीत हैं। रहस्यवाद को तार्किक रूप से समझाया नहीं जा सकता। सभी रहस्यवादी स्वयं को बाहरी संसार से अलग करके आंतरिक संसार से जुड़ने का प्रयास करते हैं। उक्त बातें रवीन्द्र नाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित पेंटिंग सह पोस्टर प्रतियोगिता का उद्घाटन करते हुए पूर्व अंग्रेजी विभागाध्यक्ष सह मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो ए. के. बच्चन ने कही।

एनएसएस के विश्वविद्यालय समन्वयक डॉ. आरएन चौरसिया ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कहा कि रवीन्द्र नाथ और उनके विचारों को किसी एक श्रेणी में रखना कठिन है। जैसा कि गीतांजलि में दिखाया गया है, ये विचार बहुत भिन्न हैं। फिर भी समग्र रूप से एक-दूसरे के पूरक हैं। ये कवि के वास्तविक भावों को दर्शाते हैं। यह कृति न केवल टैगोर और बंगाली पुनर्जागरण में रूचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक उत्कृष्ट रचना है, बल्कि दर्शनशास्त्र में रूचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य पठनीय कृति है। कार्यक्रम में मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो अरुण कुमार कर्ण ने कहा कि गीतांजलि में प्रकृति का विषय भी निहित है। यह ईश्वर और प्रकृति के बीच संबंध को दर्शाती है। उनके गीत अपनी सुंदरता और बिम्बों से परिपूर्णता के कारण विशिष्ट हैं। ये बिम्ब प्रकृति और भारतीय पौराणिक कथाओं से लिए गए हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो पुनिता झा ने कहा कि गीतांजलि में प्रेम के अनेक रूप देखने को मिलते हैं, जिनमें स्त्रियों के प्रति प्रेम, अन्य लोगों के प्रति प्रेम, मानवता के प्रति प्रेम, ईश्वर के प्रति प्रेम, प्रकृति के प्रति प्रेम, अपने देश के प्रति प्रेम, सौंदर्य के प्रति प्रेम और सत्य के प्रति प्रेम आदि शामिल हैं। टैगोर ईश्वर और धर्म से प्रेम करने वाले कवि हैं और उनकी कविताएँ संसार के सत्य, सुख और सौंदर्य को दर्शाती हैं।

डॉ शांभवी ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुआ कहा कि गीतांजलि केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है। यह पाठक को अपने “मैं” (अहंकार) को मिटाकर ईश्वर के साथ एक होने की प्रेरणा देती है। यह रचना आज भी अपने शांत, सौम्य और दार्शनिक स्वर के कारण प्रासंगिक है।
डॉ संकेत कुमार झा ने कहा कि गीतांजलि ईश्वर की प्रार्थना है। यह ईश्वर के स्तुति और प्रशंसा में रचे गए गीतों का संग्रह है। ये गीत भारतीय वैष्णव काव्य की प्राचीन परंपरा में गहराई से निहित हैं और इनमें रहस्यमय, शाश्वत और उदात्त गुण समाहित हैं। डॉ तनिमा कुमारी ने कहा कि गीतांजलि में भावों और प्रस्तुतीकरण की व्यापक विविधता देखने को मिलती है। रवीन्द्र नाथ दार्शनिक, राष्ट्रभक्ति, साहित्यकार, संगीतकार एवं कलाकार थे, जिसकी झलक हमें गीतांजलि में मिलती है। इसी ग्रंथ पर उन्हें 1913 में नोबेल सम्मान मिला था। ईश्वर का विषय संपूर्ण गीतांजलि में व्याप्त है।

प्रतियोगिता में कुल 45 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिसमें रूबीना परवीन, आन्या कुमारी, शैलजा सरोज, सिमरन साक्षी और गौतम अचार्य क्रमशः प्रथम से पांचवें स्थान पर रहें। निर्णायक मंडल के सदस्यों में प्रो अरुण कुमार कर्ण, डॉ आर एन चौरसिया तथा डॉ अभिलाषा कुमारी शामिल रहे।

कार्यक्रम में पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो मंजू राय, पूर्व अंग्रेजी-प्राध्यापक डॉ अमरेन्द्र शर्मा, डॉ आर्यिका पॉल, ज्योति कुमारी, उत्कर्ष उमंग, आर्यन कुमार, शेफाली मालाकार, रवि कुमार एवं साक्षी आदि ने सक्रिय भूमिका निभाया। अतिथियों का स्वागत डॉ शांभवी ने, जबकि संचालन शेफाली मालाकार ने किया। धन्यवाद ज्ञापन फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने करते हुए कहा कि सभी सफल प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र एवं मैडल समापन समारोह के अवसर पर दिया जाएगा।

