डेस्क: भारत (India) में दवा कंपनियों (Pharmaceutical companies) द्वारा डॉक्टरों (डॉक्टरों ) को महंगे उपहार देने और विदेश यात्राओं का खर्च उठाने पर अब लगाम लग सकती है। सरकार ने मंगलवार, 21 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट में बताया कि वह इस तरह की मार्केटिंग गतिविधियों को रोकने पर गंभीरता से विचार कर रही है। इसके लिए उसे लगभग दो महीने का समय लग सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड में लेते हुए मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई 2026 तक के लिए टाल दी है।
दवा मार्केटिंग पर सख्त नियमों की मांग
यह मामला फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FMRAI) द्वारा वर्ष 2021 में दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में दवाओं की मार्केटिंग से संबंधित नियमों को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने 1 मई 2025 को सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि डॉक्टरों को प्रिस्क्रिप्शन में केवल जेनेरिक दवाएं लिखने पर जोर दिया जाना चाहिए।
महंगे इलाज और दवाओं पर सवाल
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि दवा कंपनियां डॉक्टरों को प्रभावित करने के लिए कई तरह के प्रलोभन देती हैं, जिससे मरीजों को जरूरत से ज्यादा महंगी दवाएं लिखी जाती हैं। कोरोना काल के दौरान “डोलो 650” दवा के अत्यधिक प्रिस्क्रिप्शन का उदाहरण देते हुए याचिका में दावा किया गया कि इस तरह की प्रथाओं से दवाओं की बिक्री बढ़ाई जाती है, जिससे मरीजों पर आर्थिक बोझ पड़ता है।
1,000 करोड़ रुपये खर्च का दावा
याचिका में यह भी कहा गया है कि दवा कंपनियां डॉक्टरों को गिफ्ट, विदेश यात्राएं और अन्य सुविधाएं देने पर करीब 1,000 करोड़ रुपये तक खर्च करती हैं। इसके जरिए दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन को प्रभावित करने का आरोप लगाया गया है।
नियम मौजूद, लेकिन कानूनी बाध्यता नहीं
सरकार की ओर से बनाए गए यूनिफॉर्म कोड ऑफ फार्मास्यूटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज में डॉक्टरों और स्वास्थ्य पेशेवरों को किसी भी तरह के गिफ्ट या लाभ देने पर रोक का उल्लेख है। हालांकि, यह कोड कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, जिसके चलते इसका पालन पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो पाता। याचिका में इसी को मुख्य समस्या बताया गया है।

