डेस्क: 2021 में सत्ता पर काबिज होने के बाद से तालिबान सरकार (Taliban Government) द्वारा महिलाओं के अधिकारों पर लगातार प्रतिबंध लगाए गए हैं। अब देश में लागू की गई नई 90 पन्नों की दंड संहिता को लेकर मानवाधिकार संगठनों (Human Rights Organizations) और कानूनी विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। इस संहिता पर तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा (Hibatullah Akhundzada) ने हस्ताक्षर किए हैं।
‘दे महाकुमु जजाई उसूलनामा’ क्या है?
नए नियमों को आधिकारिक तौर पर ‘दे महाकुमु जजाई उसूलनामा’ नाम दिया गया है। इसके तहत दंड तय करते समय सामाजिक और धार्मिक श्रेणी को महत्व दिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, व्यवस्था में समाज को उच्च और निम्न वर्गों में विभाजित करने की अवधारणा शामिल है। धार्मिक नेताओं को ऊपरी श्रेणी में रखा गया है, जबकि अन्य वर्गों के लिए शारीरिक दंड को अधिक स्वीकार्य माना गया है।
विश्लेषकों का कहना है कि व्यवहारिक रूप से महिलाओं को पुरुष संरक्षक के अधीन माना गया है, जिससे पारिवारिक ढांचे में पति की भूमिका को प्रमुख और पत्नी की स्थिति को अधीनस्थ रूप में परिभाषित किया गया है।
घरेलू हिंसा मामलों में जटिल प्रक्रिया
नए प्रावधानों के तहत गंभीर अपराधों की सुनवाई धार्मिक मौलवियों द्वारा की जाएगी, जबकि कम गंभीर मामलों में ‘ताज़ीर’ श्रेणी की सजा लागू हो सकती है। आलोचकों का कहना है कि घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया बेहद कठिन बना दी गई है।
महिला को गंभीर शारीरिक चोट के प्रमाण पेश करने होंगे।
अदालत में पेशी के दौरान पूर्ण पर्दा अनिवार्य होगा।
एक पुरुष संरक्षक की मौजूदगी जरूरी होगी।
रिपोर्टों के अनुसार, दोष सिद्ध होने पर भी सजा की अवधि सीमित हो सकती है, जिससे पीड़ित पक्ष को पर्याप्त न्याय मिलने पर सवाल उठ रहे हैं।
पहले से जारी प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि
तालिबान शासन के दौरान महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर पहले ही व्यापक प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं। माध्यमिक और उच्च शिक्षा में प्रवेश सीमित है, कई क्षेत्रों में महिलाओं के काम करने पर रोक है, और सार्वजनिक स्थानों पर सख्त ड्रेस कोड लागू है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई दंड संहिता से महिलाओं की न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले ही अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति को लेकर चिंता जता चुका है, और इस नए कानून के बाद वैश्विक स्तर पर बहस और तेज होने की संभावना है।
नई कानूनी व्यवस्था को लेकर अफगानिस्तान में महिलाओं की सुरक्षा, न्यायिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
