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300 सीटों की संसद में हिंदू प्रतिनिधित्व सिमटा, बांग्लादेश चुनाव के नतीजों ने उठाए सवाल

डेस्क: बांग्लादेश के हालिया संसदीय चुनाव (Bangladesh Election) के नतीजों ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। 300 सदस्यीय संसद के लिए हुए चुनाव में अल्पसंख्यक, खासकर हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व (Representation of Hindu community) बेहद सीमित रह गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस बार केवल 3 हिंदू उम्मीदवार ही संसद तक पहुंच सके।

चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने 209 सीटों पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरकर सामने आई है। पार्टी नेता तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने की संभावना जताई जा रही है। वहीं जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं, जबकि छात्र-समर्थित दल NCP को केवल 6 सीटों पर सफलता मिली।

आबादी के मुकाबले बेहद कम प्रतिनिधित्व

2022 की जनगणना के अनुसार बांग्लादेश की कुल आबादी लगभग 16.5 करोड़ है, जिसमें 1 करोड़ 31 लाख से अधिक हिंदू नागरिक हैं—यानी करीब 8 प्रतिशत आबादी। इसके बावजूद संसद में उनका प्रतिनिधित्व 1 प्रतिशत से भी कम रह जाना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

पहले संसद में हिंदू सांसदों की संख्या सामान्यतः 14 से 20 के बीच रहती थी, लेकिन इस बार यह घटकर सिर्फ 3 रह गई। इसे पिछले दो दशकों में सबसे बड़ी गिरावट माना जा रहा है।

कितने अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में थे?

इस चुनाव में कुल 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे थे, जिनमें 10 महिलाएं भी शामिल थीं।
करीब 22 राजनीतिक दलों ने अल्पसंख्यक प्रत्याशियों को टिकट दिया। BNP ने 6 अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 4 जीतने में सफल रहे, लेकिन कुल प्रतिनिधित्व फिर भी सीमित ही रहा।

क्यों उठ रहे हैं सवाल?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कई क्षेत्रों में अल्पसंख्यक मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन टिकट वितरण, स्थानीय समीकरण और सुरक्षा चिंताओं के कारण उनकी राजनीतिक भागीदारी कम रह जाती है।

चुनाव के दौरान सांप्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा भी चर्चा में रहा, जिसने इस गिरावट को और संवेदनशील बना दिया।

महिला प्रतिनिधित्व भी रहा कम

इस बार चुनाव में महिला उम्मीदवारों की जीत भी सीमित रही। कुल 7 महिलाएं ही संसद पहुंच सकीं, जिनमें अधिकांश BNP से थीं। कुछ दलों के बयानों ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर भी विवाद खड़ा किया।

विश्लेषकों का निष्कर्ष:

नतीजों ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या बांग्लादेश की सामाजिक विविधता संसद में समान रूप से परिलक्षित हो रही है या नहीं। अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का यह मुद्दा आने वाले समय में देश की राजनीति का अहम विषय बन सकता है।

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