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चमकती सड़कों के पीछे कराहते शहर: भारत की ग्रोथ, लेकिन शहरी ज़िंदगी क्यों बेहाल?

मुंबई | विशेष रिपोर्ट

भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। हवाई अड्डे चमक रहे हैं, एक्सप्रेसवे दौड़ रहे हैं, मेट्रो शहरों की रफ्तार बढ़ा रही है। लेकिन इसी चमक के बीच एक कड़वा सच छुपा है,भारत के शहर रहने लायक़ क्यों नहीं बन पा रहे?

बेंगलुरु, जिसे देश की सिलिकॉन वैली कहा जाता है, वहां ट्रैफिक जाम अब सिर्फ आम लोगों की नहीं, बल्कि अरबपति उद्यमियों की भी रोज़मर्रा की परेशानी बन चुका है। सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक, नाराज़गी खुलकर सामने आ रही है।

मुंबई में हर मॉनसून के साथ गड्ढे, जाम सीवर और सड़कों पर बहता गंदा पानी लोगों के धैर्य की परीक्षा लेता है। विरोध भी होते हैं, लेकिन व्यवस्था जस की तस बनी रहती है।

दिल्ली में सर्दियां आते ही स्मॉग लौट आता है बच्चे, बुज़ुर्ग और बीमार सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि डॉक्टरों को लोगों को शहर छोड़ने की सलाह देनी पड़ रही है।

सवाल सीधा है,जब सरकार राष्ट्रीय स्तर पर छवि सुधारने और बुनियादी ढांचे पर अरबों रुपये खर्च कर रही है, तो शहरों की बुनियादी समस्याएं जस की तस क्यों हैं?

विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या सिर्फ पैसों की नहीं, शासन व्यवस्था की है। इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ विनायक चटर्जी के मुताबिक, भारत के शहरों के पास आज भी मज़बूत और स्वतंत्र शहरी शासन मॉडल नहीं है। संविधान में सत्ता का विकेंद्रीकरण केंद्र और राज्यों तक सीमित रहा, शहरों के भविष्य की कल्पना तब नहीं की गई थी।

हालात को और जटिल बनाता है डेटा का अभाव। भारत की आख़िरी जनगणना को 15 साल से ज़्यादा हो चुके हैं। तब शहरी आबादी 30% थी, जबकि आज अनुमान है कि देश का लगभग आधा हिस्सा शहरी हो चुका है। अगली जनगणना 2026 तक टल चुकी है।

बिना सही आंकड़ों के शहरों की योजनाएं कैसे बनेंगी,यह सवाल अब गंभीर होता जा रहा है।

74वें संवैधानिक संशोधन के तहत शहरी निकायों को जो ताक़त मिलनी थी, वह ज़मीन पर पूरी तरह लागू नहीं हो पाई। नतीजा यह है कि शहरों की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं, लेकिन राजनीतिक प्राथमिकता नहीं बन पा रहीं।

विश्लेषकों का मानना है कि भारत शायद अब एक “टिपिंग पॉइंट” की ओर बढ़ रहा है,जहां हालात इतने बिगड़ेंगे कि शहरी संकट राजनीति के केंद्र में आ जाएगा। इतिहास गवाह है कि जब संकट चरम पर पहुंचता है, तभी बड़े सुधार जन्म लेते हैं।

तब तक सवाल यही रहेगा,क्या भारत की आर्थिक उड़ान, उसके शहरों को भी सांस लेने लायक बना पाएगी?

आशुतोष झा

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