अंतरराष्ट्रीय बिहार

भारत अब रूस से क्यों नहीं खरीदेगा तेल,इससे रूस पर क्या असर पड़ेगा

नेशनल डेस्कः बीते कुछ सालों से रूस भारत का सबसे बड़ा और सबसे सस्ता तेल सप्लायर बना हुआ था। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद जब यूरोप ने रूसी तेल से दूरी बनाई, तब भारत ने डिस्काउंट पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतें सस्ती रखीं।

लेकिन दिसंबर 2025 में यह पूरी तस्वीर पलटती नजर आ रही है।भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल की खरीद दिसंबर में तीन साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है—अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और अन्य पश्चिमी देशों की कड़े प्रतिबंधों की नई लहर।

अमेरिकी प्रतिबंधों का बढ़ा खतरा—भारत क्यों डर रहा है?रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अमेरिका ने अब अपनी सख्ती और बढ़ा दी है। इस बार निशाना बनाया गया है रूस की तेल दिग्गज कंपनियों को:Rosneft (रोसनेफ्ट)

 

Lukoil (लुकोइल)

 

अमेरिका ने साफ चेतावनी दी है कि इन कंपनियों से जुड़ा कोई भी लेनदेन 21 नवंबर के बाद जोखिम भरा होगा।

बैंकों ने भी कदम पीछे खींचा :भारत में रूसी तेल का भुगतान कई अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग चैनलों के जरिए होता था, लेकिन अब बैंक हर भुगतान की कड़ी जांच कर रहे हैं। किसी भी ट्रांजैक्शन से बच रहे हैं जो अमेरिकी प्रतिबंधों से टकरा सकता हो इसके कारण पेमेंट क्लियरेंस में भारी देरी होने लगी है। इसी वजह से भारत की रिफाइनरियां अब सावधानी से और सीमित मात्रा में रूसी तेल ले रही हैं।

नवंबर में बंपर खरीद—दिसंबर में अचानक गिरावट

तेल आयात के आंकड़े इस बदलाव को साफ दिखाते हैं:नवंबर 2025 मेंभारत ने लगभग 18.7 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) रूसी कच्चा तेल खरीदने का अनुमान लगाया था। यह ‘स्टॉक-अप मोड’ था, क्योंकि कंपनियां प्रतिबंध लागू होने से पहले जमकर खरीदना चाहती थीं।

दिसंबर 2025 में आयात गिरकर सिर्फ 6 लाख – 6.5 लाख बैरल प्रतिदिन होने की उम्मीद। यह नवंबर की तुलना में लगभग 70% की भारी गिरावट है।

यह तब हो रहा है जब:अक्टूबर में आयात 1.65 मिलियन bpd था

यूरोपीय यूनियन ने नया नियम जोड़ा है:

21 जनवरी के बाद EU उन रिफाइनरियों का फ्यूल नहीं खरीदेगा जिन्होंने पिछले 60 दिनों में रूसी क्रूड इस्तेमाल किया हो। इससे भारत की बड़ी एक्सपोर्ट रिफाइनरियों पर बड़ा असर पड़ा है।

कौन-कौन सी भारतीय कंपनियां क्या कर रही हैं?1. सरकारी तेल कंपनियां – रूसी तेल से दूरी

MRPL (मैंगलोर रिफाइनरी)

 

HPCL (हिंदुस्तान पेट्रोलियम)

 

MEL (मित्तल एनर्जी)इन सभी ने लगभग रूसी तेल खरीदना बंद कर दिया है।

IOC और BPCL ने भी साफ कहा है कि वे सिर्फ उन्हीं सप्लायर्स से तेल लेंगे जिन पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

2. Nayara Energy – मजबूरी में सिर्फ रूसी तेल

नायरा में रूस की रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी है।

इस कारण कंपनी अन्य सप्लायर्स से तेल नहीं ले पा रही नायरा अब लगभग पूरी तरह रूसी तेल पर निर्भर हैरिलायंस की दो मेगा रिफाइनरियां हैं, जिनमें से एक मुख्य रूप से एक्सपोर्ट मार्केट के लिए काम करती है।

कंपनी अब केवल 22 अक्टूबर से पहले बुक किए गए (pre-committed) रूसी कार्गो ही प्रोसेस कर रही है

नए अमेरिकी और EU नियमों का पालन करना रिलायंस के लिए अनिवार्य है, वरना निर्यात पर बड़ा असर पड़ेगा

भू-राजनीतिक दबाव के कारण एक और दिलचस्प बदलाव सामने आया है:

अक्टूबर में भारत के तेल आयात में अमेरिकी तेल की हिस्सेदारी जून 2024 के बाद सबसे अधिक हो गई

भारत और अमेरिका के बीच कीमतों के अंतर (Arbitrage Window) ने अमेरिकी तेल को आकर्षक बना दिया

अमेरिका ने भारत पर आयात शुल्क 50% कर दिया है। अमेरिका भारत को यह संदेश देना चाहता है कि रूस पर निर्भरता कम करो और अमेरिकी ऊर्जा खरीद बढ़ाओ। भारत अब ऊर्जा सोर्सिंग में व्यापार, कूटनीति और सुरक्षा—तीनों की कसौटी पर नए फैसले लेने को मजबूर है।पूरी तरह नहीं — लेकिन इस बात के संकेत स्पष्ट हैं कि आने वाले महीनों में रूसी आयात काफी कम रहेगा। भारतीय कंपनियां भुगतान जोखिम, प्रतिबंध, और EU के नियमों को देखते हुए संतुलित रणनीति अपनाएंगी। भारत को अब अपने तेल आयात में अमेरिका, मध्य-पूर्व और अफ्रीका पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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