Bihar elction 2025 बिहार की सियासत इस वक्त चरम पर है। चुनावी माहौल में गुरुवार को हुए पहले चरण के मतदान ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया। इस बार मतदाताओं ने ऐसा जोश दिखाया कि बिहार के इतिहास में रिकॉर्ड वोटिंग दर्ज की गई।121 सीटों पर हुए मतदान में 64.69% वोट पड़े, जो साल 2020 के मुकाबले लगभग 8% ज्यादा हैं। इतने उत्साह के बाद अब बड़ा सवाल यही है कि क्या यह वोटिंग नीतीश कुमार की वापसी का संकेत है या जनता बदलाव चाहती है?
इतिहास में सबसे ज्यादा वोटिंग :पहले चरण में 3.75 करोड़ मतदाताओं ने वोट डालने का अधिकार रखा, जिनमें से 2.42 करोड़ लोगों ने मतदान किया। यह 2020 के मुकाबले करीब 36 लाख अधिक वोटरों की भागीदारी है। इससे पहले 2020 में पहले चरण में 56.1%, 2015 में 55.9%, और 2010 में 52.1% मतदान हुआ था। इस बार का आंकड़ा दिखाता है कि बिहार की जनता पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय और जागरूक होकर मतदान केंद्रों तक पहुंची है।
बिहार में बंपर वोटिंग- बदलाव या भरोसे का संकेत? भारत के चुनावी इतिहास में यह अक्सर देखा गया है कि जब वोटिंग ज्यादा होती है, तो जनता परिवर्तन की इच्छा जताती है। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता। मध्य प्रदेश, ओडिशा और गुजरात जैसे राज्यों में भी ज्यादा वोटिंग के बावजूद सत्ताधारी दलों ने सत्ता बचाई थी। वहीं राजस्थान, तमिलनाडु और यूपी में उच्च मतदान के बाद सरकारें बदलीं। इसलिए बिहार में यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि जनता नीतीश कुमार को बदलना चाहती है या दोबारा मौका देने के मूड में है।
महिला वोटर बने गेम चेंजर :इस बार सबसे दिलचस्प पहलू रहा महिलाओं की भारी भागीदारी। बिहार में 2005 से अब तक महिला वोटर्स ने कई बार नीतीश कुमार को सत्ता दिलाई है। साइकिल योजना और शराबबंदी जैसी योजनाओं ने उन्हें नीतीश का स्थायी वोट बैंक बना दिया था। हालांकि 2020 में यह समर्थन थोड़ा कमजोर हुआ, लेकिन 2025 में नई महिला सहायता योजना के साथ नीतीश ने फिर वही भरोसा जगाने की कोशिश की है। वहीं, तेजस्वी यादव ने भी महिलाओं को लुभाने के लिए बड़ा दांव चला है। हर महिला को ₹30,000 देने का वादा। जबकि नीतीश सरकार ने ₹10,000 सहायता राशि का एलान किया है। अब देखना होगा कि महिला वोट किस ओर झुकते हैं, क्योंकि यही तय करेगा कि पटना की कुर्सी किसे मिलेगी।
त्रिकोणीय मुकाबला और सस्पेंस :पहले चरण में मतदान दरभंगा, तिरहुत, कोसी, सारण, मुंगेर और भागलपुर डिवीजनों में हुआ। 2020 में इन 121 सीटों में से 60 सीटें एनडीए और 61 सीटें महागठबंधन को मिली थीं। लेकिन इस बार प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी मैदान में है, जिसने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। एनडीए इसे जनविश्वास की जीत बता रहा है, जबकि महागठबंधन इसे बदलाव की लहर कह रहा है।
दूसरे चरण पर टिकी निगाहें :अब पूरा बिहार 11 नवंबर का इंतजार कर रहा है, जब दूसरे चरण की वोटिंग होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिन इलाकों में सरकार की योजनाएं कामयाब रहीं, वहां एनडीए को फायदा मिल सकता है, जबकि बेरोजगारी और पलायन जैसी समस्याओं वाले क्षेत्रों में महागठबंधन की पकड़ मजबूत है। फिलहाल, यह साफ है कि बिहार में जनता ने अपनी चुप्पी तोड़ दी है। अब देखना यह है कि यह बंपर वोटिंग बदलाव की दस्तक है या नीतीश की निरंतरता का भरोसा, जिसका जवाब 14 नवंबर को आने वाले नतीजे ही देंगे।
