राष्ट्रीय

शिक्षा युद्ध मानसिकता को बदलने का सशक्त माध्यम बने

विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में मनाया जाता है। इस दिन आध्यापकों को सामान्य रूप से और कतिपय कार्यरत एवं सेवानिवृत्त शिक्षकों को उनके विशेष योगदान के लिये सम्मानित किया जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा साल 1966 में यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की उस संयुक्त बैठक को याद करने के लिये मनाया जाता है, जिसमें शिक्षकों की स्थिति पर चर्चा हुई थी और इसके लिये सुझाव प्रस्तुत किये गये थे। इस दिवस को 1994 के बाद से प्रतिवर्ष लगभग 100 से अधिक देशों में मनाया जा रहा है और इस प्रकार वर्ष 2025 में यह 33वाँ विश्व शिक्षक दिवस होगा। इस साल की थीम है-‘शिक्षण को सहयोगी पेशे के रूप में फिर से परिभाषित करना।’ इसका मतलब है कि पढ़ाई सिर्फ एक व्यक्ति का काम नहीं होना चाहिए। शिक्षक आपस में मिलकर अनुभव शेयर करें, नई तकनीकें अपनाएं और मिलकर शिक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाएं। इस तरह शिक्षक न सिर्फ अपने पेशे में संतुष्ट रहेंगे, बल्कि छात्रों को भी बेहतर शिक्षा मिल सकेगी। इस साल का संदेश यही है कि शिक्षा को सुधारने के लिए शिक्षण को व्यक्तिगत प्रयास से ऊपर उठाकर साझेदारी और सहयोग का पेशा बनाना होगा। जब शिक्षक मिलकर विचार साझा करेंगे और जिम्मेदारियां बांटेंगे, तभी शिक्षा अधिक प्रभावी और प्रेरक बन पाएगी। शिक्षक सिर्फ ज्ञान देने वाले नहीं होते, बल्कि वे समाज में नवाचार, समानता और परिवर्तन के बीज बोते हैं। वे बच्चों को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस सिखाते हैं, शिक्षक ही दुनिया में शांति एवं सह-जीवन का प्रभावी सन्देश दे सकते हैं। शिक्षक को पर्याप्त सम्मान, सहयोग और अवसर मिलें तो शिक्षा के माध्यम से एक आदर्श समाज-व्यवस्था एवं शांति की विश्व-संरचना स्थापित की जा सकती है। 2025 में विश्व शिक्षक दिवस की सबसे बड़ी सभा अदीस अबाबा, इथियोपिया में आयोजित हो रही है।

विश्व शिक्षक दिवस केवल एक औपचारिकता या शिक्षकों का अभिनंदन करने का अवसर भर नहीं है, बल्कि यह अवसर है शिक्षा की दिशा और दशा को लेकर गहन चिंतन करने का। यह अवसर है यह विचारने का कि आज शिक्षा क्या दे रही है और क्या उसे देना चाहिए। यह अवसर है यह पूछने का कि आज की शिक्षा व्यवस्था केवल नौकरी, व्यवसाय और उपभोग की भूख को बढ़ाने का साधन क्यों बन गई है, क्यों उसमें जीवनमूल्य, नैतिकता, शांति, सहअस्तित्व और अहिंसा जैसे आधारभूत तत्व लुप्त होते जा रहे हैं। यदि शिक्षा का ध्येय केवल ज्ञानार्जन या रोजगार प्राप्ति है तो वह अधूरी है। शिक्षा का परम ध्येय है-मनुष्य को मनुष्य बनाना, उसे सह-अस्तित्व, अमन और अयुद्ध की स्थितियों के प्रति उन्मुख करना।

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