डेस्क: धनतेरस और शादी (Dhanteras and Weddings) के सीजन से पहले सोने (Gold) की कीमतों में आई भारी गिरावट ने खरीदारों और निवेशकों को असमंजस में डाल दिया है। जिस सोने (Gold) के दाम जनवरी में 1.75 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के पार पहुंच गए थे, वह अक्टूबर के अंत तक करीब 1.43 लाख रुपये पर आ गया है। यानी अपने उच्चतम स्तर से सोने की कीमत में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि धनतेरस पर सोना खरीदना फायदे का सौदा होगा या अभी कुछ समय इंतजार करना बेहतर रहेगा?
सोने की कीमतों में गिरावट के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियां और खासकर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की बढ़ती यील्ड को प्रमुख वजह बताया जा रहा है। अमेरिका में महंगाई की आशंका, ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने निवेशकों की रणनीति बदल दी है। इसका असर सोने की मांग और कीमतों पर भी पड़ रहा है।
क्या है अमेरिकी बॉन्ड और यील्ड का गणित?
सोने की कीमतों में गिरावट को समझने के लिए अमेरिकी सरकारी बॉन्ड और उसकी यील्ड का अर्थ जानना जरूरी है। दरअसल, बॉन्ड को एक तरह की उधार की रसीद माना जा सकता है। जब कोई सरकार बाजार से पैसा उधार लेती है तो वह निवेशकों को बॉन्ड जारी करती है। इसके बदले सरकार तय शर्तों के अनुसार ब्याज देती है और निर्धारित अवधि पूरी होने पर मूल रकम लौटाती है।
अमेरिकी सरकार भी अपने खर्चों के लिए ऐसे बॉन्ड जारी करती है। इन्हें दुनिया के सबसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में गिना जाता है। बॉन्ड पर मिलने वाले सालाना रिटर्न को उसकी यील्ड कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड 5 प्रतिशत है तो निवेशक को उसके निवेश के अनुपात में सालाना करीब 5 प्रतिशत रिटर्न मिल सकता है। हालांकि वास्तविक रिटर्न बॉन्ड की खरीद कीमत और उसकी शर्तों पर निर्भर करता है।
बॉन्ड की कीमतों में बाजार के अनुसार बदलाव होता है और यील्ड भी उसी हिसाब से ऊपर-नीचे होती रहती है। जब बॉन्ड की कीमत घटती है तो उसकी यील्ड बढ़ जाती है। यही वजह है कि अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड पर पूरी दुनिया के निवेशकों की नजर रहती है।
बॉन्ड की बढ़ती यील्ड से सोने पर क्यों पड़ता है दबाव?
सोने और अमेरिकी बॉन्ड के बीच निवेश के लिहाज से प्रतिस्पर्धा रहती है। सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन इससे नियमित ब्याज या कोई निश्चित आय नहीं होती। इसके विपरीत अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर निवेशकों को ब्याज के रूप में नियमित रिटर्न मिलता है।
ऐसे में जब अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड बढ़ती है तो बड़े निवेशकों और वित्तीय संस्थानों के लिए बॉन्ड अधिक आकर्षक हो जाते हैं। वे सोने में निवेश घटाकर अपना पैसा अमेरिकी बॉन्ड में लगाने लगते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की मांग पर दबाव पड़ता है और कीमतें नीचे आने लगती हैं।
इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड में निवेश के लिए डॉलर की मांग भी बढ़ सकती है। डॉलर मजबूत होने पर भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों पर दबाव पड़ता है। यही कारण है कि अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड और डॉलर की चाल सोने के बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
महंगाई और कच्चे तेल ने बढ़ाई चिंता
अमेरिका में महंगाई को लेकर बनी आशंकाएं भी बॉन्ड की यील्ड ऊंची रहने की एक बड़ी वजह हैं। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से परिवहन, उत्पादन और दूसरी आर्थिक गतिविधियों की लागत बढ़ती है। इसका असर महंगाई पर पड़ सकता है।
महंगाई को नियंत्रित करने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को ऊंचा रख सकता है। इससे बॉन्ड की यील्ड को भी समर्थन मिलता है। निवेशकों को आशंका है कि महंगाई के आंकड़े अनुकूल नहीं रहे तो भविष्य में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे माहौल में सोने की कीमतों पर दबाव बने रहने की संभावना जताई जा रही है।
धनतेरस पर खरीदें या अभी करें इंतजार?
धनतेरस पर सोना खरीदने की तैयारी कर रहे लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि मौजूदा गिरावट के बीच खरीदारी की जाए या कीमतें और नीचे आने का इंतजार किया जाए। बाजार विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक, सोने की अगली चाल काफी हद तक अमेरिका की आर्थिक स्थिति, ब्याज दरों और पश्चिम एशिया के तनाव पर निर्भर करेगी।
यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और अमेरिका में महंगाई का दबाव कम नहीं होता है तो बॉन्ड की यील्ड लंबे समय तक ऊंची रह सकती है। इससे सोने की कीमतों में तेजी आने की संभावना सीमित हो सकती है। कुछ बाजार आकलनों में अगले पांच से छह महीने तक अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड ऊंची बने रहने की आशंका जताई गई है। हालांकि परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव संभव है।
शादी और त्योहार की खरीदारी में क्या रखें ध्यान?
धनतेरस पर परंपरा के अनुसार सोना खरीदना चाहते हैं तो केवल कीमतों में गिरावट देखकर बड़े निवेश का फैसला करना जरूरी नहीं है। शगुन के लिए सीमित खरीदारी और निवेश के उद्देश्य से बड़ी खरीदारी के बीच अंतर रखना चाहिए। निवेशकों के लिए एकमुश्त बड़ी रकम लगाने के बजाय अलग-अलग समय पर चरणबद्ध खरीदारी करना जोखिम को कम करने का एक तरीका हो सकता है।
आने वाले दिनों में अमेरिकी मध्यावधि चुनाव, फेडरल रिजर्व के ब्याज दर संबंधी फैसले, कच्चे तेल की कीमतें और पश्चिम एशिया के हालात सोने की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे।
फिलहाल सोने की कीमतों में तेजी लौटने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में धनतेरस पर खरीदारी करने वालों के लिए जरूरी है कि वे अपनी जरूरत, बजट और निवेश की अवधि को ध्यान में रखकर फैसला करें। सोने के भाव में गिरावट के बाद भी आगे कीमतें और गिरेंगी या फिर तेजी लौटेगी, इसकी निश्चित भविष्यवाणी करना संभव नहीं है।


