डेस्क: राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (National Film Awards) भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) में उत्कृष्ट फिल्मों, कलाकारों और तकनीकी प्रतिभाओं को सम्मानित करने वाला प्रमुख राष्ट्रीय सम्मान (National Honour) है। इसकी शुरुआत आज से 72 साल पहले हुई थी। वर्ष 1954(1954) में पहली बार पुरस्कार दिए गए और उस समय इसका आधिकारिक स्वरूप आज से काफी अलग था। शुरुआत में इसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार नहीं, बल्कि स्टेट अवॉर्ड फॉर फिल्म (State Award For Film) के नाम से जाना जाता था।
इन पुरस्कारों की नींव 1949 में बनाई गई फिल्म जांच समिति की सिफारिशों के बाद पड़ी। समिति ने भारतीय फिल्म उद्योग की स्थिति, फिल्मों की गुणवत्ता और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव का अध्ययन किया था। इसी प्रक्रिया के बाद सरकार ने फिल्मों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी स्तर पर पुरस्कार शुरू करने का फैसला किया।
पहले पुरस्कार वर्ष 1953 में रिलीज हुई फिल्मों के लिए दिए गए थे। उस समय देश के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे और सूचना एवं प्रसारण मंत्री बीवी केसकर थे। शुरुआती दौर में मुख्य रूप से फीचर फिल्म, डॉक्यूमेंट्री और बच्चों की फिल्मों को पुरस्कारों के लिए शामिल किया गया था।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की एक महत्वपूर्ण विशेषता शुरुआत से ही अलग-अलग भारतीय भाषाओं की फिल्मों को सम्मान देना रही। यह पुरस्कार केवल हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं रहे। बंगाली, मराठी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, असमिया और अन्य भाषाओं की फिल्मों को भी समय के साथ इसमें जगह मिली। इससे देश के विविध सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह 10 अक्टूबर 1954 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में हुआ था। सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का स्वर्ण पदक मराठी फिल्म श्यामची आई को मिला। सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फिल्म का पुरस्कार महाबलीपुरम को दिया गया। हिंदी फिल्म दो बीघा जमीन और बांग्ला फिल्म भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य को ऑल इंडिया सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट मिला।
शुरुआती वर्षों में अभिनेता और अभिनेत्रियों के लिए अलग पुरस्कार नहीं थे। कलाकारों और तकनीशियनों के लिए अलग-अलग सम्मान 1967 की फिल्मों से शुरू हुए और विजेताओं को 1968 में सम्मानित किया गया। उत्तम कुमार पहले सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बने, जबकि नरगिस दत्त पहली सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री रहीं। उस समय इन पुरस्कारों को भारत अवॉर्ड और उर्वशी अवॉर्ड के नाम से जाना जाता था।
समय के साथ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का दायरा लगातार बढ़ा। सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, संगीत, प्लेबैक सिंगिंग, स्क्रीनप्ले, कॉस्ट्यूम, मेकअप, साउंड, कोरियोग्राफी, स्टंट और वीएफएक्स जैसी तकनीकी श्रेणियां भी शामिल की गईं। 1969 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार शुरू हुआ और देविका रानी इसकी पहली प्राप्तकर्ता बनीं।
1973 से डायरेक्ट्रेट ऑफ फिल्म फेस्टिवल ने पुरस्कारों का प्रशासन संभाला। 2022 में सरकार के पुनर्गठन के तहत इसका राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम में विलय कर दिया गया। 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में भी कई श्रेणियों का पुनर्गठन किया गया और पुरस्कार राशि में बदलाव किया गया।
पुरस्कारों के विजेताओं का चयन निर्धारित प्रक्रिया के तहत गठित जूरी करती है। फीचर, नॉन-फीचर और सिनेमा पर लेखन के लिए अलग-अलग जूरी बनाई जाती हैं। फीचर फिल्मों के चयन में पहले क्षेत्रीय स्तर पर स्क्रीनिंग और शॉर्टलिस्टिंग होती है, जिसके बाद राष्ट्रीय जूरी अंतिम विजेताओं का चयन करती है।
रिकॉर्ड की बात करें तो सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार सबसे ज्यादा पांच बार शबाना आजमी ने जीता है। उन्हें अंकुर, अर्थ, खंडहर, पार और गॉडमदर के लिए सम्मान मिला। सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में अमिताभ बच्चन के चार पुरस्कार रहे हैं, जबकि ममूटी ने ब्रमायुगम के लिए अपना चौथा राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।
प्लेबैक सिंगिंग में के. जे. येसुदास के नाम आठ राष्ट्रीय पुरस्कार हैं। संगीतकार ए. आर. रहमान को सात राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले हैं। वहीं महान फिल्मकार सत्यजीत रे के नाम कुल 36 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हैं। इनमें छह सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और 30 सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के पुरस्कार शामिल हैं।
इस वर्ष 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का समारोह 22 सितंबर को गुजरात के केवड़िया यानी एकता नगर में आयोजित किया जा रहा है। यह पहली बार है जब राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह दिल्ली से बाहर आयोजित हो रहा है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू विजेताओं को सम्मानित करेंगी।


