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अडाणी के लिए 86 में से 84 शर्तें बदलीं? उत्तराखंड के 1320 मेगावाट पावर सौदे पर कांग्रेस के सवाल

डेस्क: उत्तराखंड में 1,320 मेगावाट की कोयला आधारित बिजली (Coal-based electricity) खरीद को लेकर कांग्रेस ने राज्य की पुष्कर सिंह धामी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने दावा किया है कि निविदा प्रक्रिया में 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किए गए, जिससे अदाणी पावर को फायदा पहुंचाने की स्थिति बनी। उन्होंने आरोप लगाया कि सार्वजनिक क्षेत्र की प्रस्तावित परियोजना को समाप्त कर निजी कंपनी से बिजली खरीद का रास्ता तैयार किया गया।
उत्तराखंड मंत्रिमंडल ने अगस्त 2026 में 1,320 मेगावाट बिजली अदाणी पावर से 25 वर्षों तक 5.746 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। सरकार के अनुसार अदाणी पावर प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी रही और यह खरीद राज्य की ऊर्जा सुरक्षा तथा बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता बढ़ाने के उद्देश्य से की जा रही है। यह समझौता नियामकीय मंजूरियों की प्रक्रिया के अधीन है।
पहले UJVN-THDC के संयुक्त उपक्रम से परियोजना का प्रस्ताव
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के अनुसार, वर्ष 2024 में उत्तराखंड सरकार ने 1,320 मेगावाट की ताप विद्युत परियोजना को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों यूजेवीएन लिमिटेड और टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड के संयुक्त उपक्रम के माध्यम से विकसित करने का प्रस्ताव रखा था।

उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) के रिकॉर्ड के मुताबिक मार्च 2024 में UPCL ने यूजेवीएन को कोयला आधारित बिजली संयंत्र स्थापित करने के लिए पत्र भेजा था। हालांकि, 16 जनवरी 2025 की बैठक में यह माना गया कि प्रस्तावित संयुक्त उपक्रम वाली परियोजना राज्य की अनुमानित बिजली मांग को पूरा करने के लिए आवश्यक समयसीमा में शुरू नहीं हो पाएगी। इसके बाद 1,320 मेगावाट बिजली की नई निविदा निकालने का फैसला किया गया।
86 में से 84 शर्तों में बदलाव का कांग्रेस का दावा
पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि केंद्रीय बिजली मंत्रालय के मानक निविदा दस्तावेज की 86 शर्तों में से 84 में बदलाव किए गए। उनके मुताबिक इनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव परियोजना स्थल से जुड़े थे। कांग्रेस का दावा है कि नई शर्तों में बिजली संयंत्र को उत्तराखंड के बजाय देश के किसी भी हिस्से में स्थापित करने की अनुमति दी गई।
खेड़ा ने यह भी आरोप लगाया कि 1,000 किलोमीटर से अधिक दूरी से बिजली उत्तराखंड तक पहुंचाने की लागत का बोझ बोलीदाता के बजाय सरकारी व्यवस्था पर डाला गया। उन्होंने फिक्स्ड चार्ज को 70 से बढ़ाकर 75 प्रतिशत किए जाने और 25 वर्ष की बिजली खरीद व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

छत्तीसगढ़ में बन रहा है संयंत्र
सरकारी जानकारी के मुताबिक अदाणी पावर से खरीदी जाने वाली 1,320 मेगावाट बिजली छत्तीसगढ़ में स्थापित किए जा रहे संयंत्र से आएगी। उत्तराखंड कैबिनेट ने 25 वर्ष के लिए 5.746 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीद की मंजूरी दी है। सरकार के अनुसार बिजली की आपूर्ति वित्त वर्ष 2029-30 से शुरू होने की उम्मीद है।
UERC के रिकॉर्ड में भी 1,320 मेगावाट की दीर्घकालिक कोयला आधारित बिजली खरीद के लिए जारी RFQ की विशिष्ट शर्तों में बदलाव, संशोधन और स्पष्टीकरण को लेकर नियामकीय प्रक्रिया दर्ज है।
25 साल में 1.6 लाख करोड़ के बोझ का दावा
कांग्रेस ने इस बिजली खरीद समझौते के संभावित वित्तीय प्रभाव पर भी सवाल उठाया है। पवन खेड़ा ने दावा किया कि 25 वर्षों में राज्य के बिजली उपभोक्ताओं पर करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
यह कांग्रेस की गणना और राजनीतिक दावा है। वास्तविक भुगतान बिजली की उपलब्धता, उत्पादन, अनुबंध की शर्तों और अन्य लागतों पर निर्भर करेगा। दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि प्रतिस्पर्धी बोली के जरिए 5.746 रुपये प्रति यूनिट की दर तय हुई है और खरीद का उद्देश्य राज्य की दीर्घकालिक बिजली जरूरतों को पूरा करना है।
कांग्रेस ने सरकार के सामने रखे आठ सवाल
उत्तराखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार से पूरी निविदा प्रक्रिया सार्वजनिक करने और स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की है। कांग्रेस ने सरकार से मुख्य रूप से ये सवाल पूछे हैं—
टेंडर की 86 में से 84 शर्तों में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?
इन बदलावों का प्रस्ताव किस अधिकारी या संस्था ने दिया?
क्या बदलाव किसी संभावित बोलीदाता की पात्रता अथवा सुविधा को प्रभावित करते थे?
उत्तराखंड की बिजली जरूरत के लिए परियोजना छत्तीसगढ़ में लगाने का निर्णय क्यों लिया गया?
बिजली की अंतिम लागत में कोयला, परिवहन, ट्रांसमिशन और अन्य शुल्क कितने होंगे?
5.746 रुपये प्रति यूनिट की दर से जुड़ा प्रतिस्पर्धी बोली का पूरा डेटा कब सार्वजनिक किया जाएगा?
25 वर्ष के पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) की प्रमुख शर्तें सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही हैं?
इस समझौते से उत्तराखंड के बिजली उपभोक्ताओं को वास्तविक आर्थिक लाभ क्या मिलेगा?
फिलहाल इस मामले में कांग्रेस के आरोपों और राज्य सरकार के ऊर्जा सुरक्षा एवं प्रतिस्पर्धी बोली के तर्क के बीच राजनीतिक बहस जारी है। अंतिम वित्तीय और नियामकीय प्रभाव का आकलन संबंधित मंजूरियों और समझौते की विस्तृत शर्तों के आधार पर होगा।

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