डेस्क: भगवान गणेश को भौतिक जगत के सर्वाधिक निकट का देवता माना जाता है; वे बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि के देव हैं। गणेश चतुर्थी, जिसे विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है, के दिन गणेश ऊर्जा से जुड़ना अत्यंत सुगम होता है। ‘गणेश’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों ‘गण’ और ‘ईश’ से मिलकर बना है। ‘गण’ का अर्थ है ‘जन-समूह’ तथा ‘ईश’ का अर्थ है ‘सर्वोच्च’ अथवा ‘स्वामी’। अतः भगवान गणेश सामान्य जन के आराध्य देव, आध्यात्मिक जगत के संरक्षक और उच्च आयामों तक पहुंच का मार्ग प्रशस्त करने वाली प्रथम ऊर्जा हैं; इसी कारण उन्हें ‘प्रथम पूज्य’ भी कहा जाता है।
इस ऊर्जा का प्रत्येक स्वरूप अपने आप में विशिष्ट महत्व रखता है। गज-शीश परम प्रज्ञा का प्रतीक है, जबकि विशाल उदर वाला मानव शरीर नाभि में स्थित मणिपूरक चक्र में संचित ऊर्जा-भंडार को दर्शाता है। गणेश परम पुरुष महादेव और सृष्टि की जननी आदिशक्ति की संतान हैं। रिद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (आध्यात्मिक शक्तियां) गणपति की पत्नियां हैं, जो यह दर्शाती हैं कि गणपति ऐसी ऊर्जा हैं जो आध्यात्मिक और भौतिक-दोनों प्रकार के वरदान प्रदान करती हैं। यह शास्त्रों के उस दर्शन की पुष्टि करता है कि उच्च लोकों अर्थात् मोक्ष अथवा मुक्ति की प्राप्ति के लिए भौतिक सुखों का उपभोग व संसिद्धि आवश्यक है।
यही कारण है कि ‘सनातन क्रिया’ जैसी यौगिक पद्धतियों में साधक को सबसे पहले गणपति साधना और गणपति जाप दिया जाता है, जो भू-लोक (सृष्टि के भौतिक आयाम) से परे के लोकों के द्वार खोलता है। जाप और माला गुरु से प्राप्त होते हैं, जो ऊर्जा को मंत्र में प्रवाहित कर उसकी सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ध्यान आश्रम के जिन साधकों ने विभिन्न मंत्र सिद्धियों का निष्ठापूर्वक अभ्यास किया है, उन्होंने विभिन्न देवी-देवताओं की प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त की है। भगवान गणेश के मंत्र पर सिद्धि प्राप्त करने के लिए जाप के दौरान माला (रुद्राक्ष) को फेरना आवश्यक है। माला के संचलन से मंत्र की शक्ति माला और उसके मेरु में संचित होती है। साधना के आगामी चरणों में विभिन्न तांत्रिक मंत्रों के प्रयोग किए जाते हैं; किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए किए जाने वाले ये प्रयोग मेरु के माध्यम से ही संपन्न होते हैं।
गणेश चतुर्थी वह दिन है जब भगवान गणेश की ऊर्जा मनुष्यों के लिए सबसे सरलता से सुलभ होती है। इस दिन गुरु के मार्गदर्शन में भाव (विचारों की शुद्धता), शुद्ध उच्चारण और उपयुक्त आहुतियों (सामग्री व समिधा) के साथ किया गया गणेश ऊर्जा का आह्वान-यज्ञ सूक्ष्म आयामों के द्वार खोलता है, जिससे साधक को अपनी वास्तविक क्षमता का बोध होता है। ऐसा यज्ञ प्रतिभागियों के घर और उनके कर्मों को शुद्ध करता है तथा विचारों व इच्छाओं के प्रकटीकरण की प्रक्रिया को गति देता है, जैसा कि ध्यान आश्रम में सनातन क्रिया का अभ्यास करने वाले साधक नित्य अनुभव करते हैं।

