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भारत का बड़ा प्रोजेक्ट और चीन को पोर्ट का काम: मालदीव की डबल गेम से बढ़ी हलचल, मुइज्जू की रणनीति ने चौंकाया

डेस्क: मालदीव(Maldives) के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू हाल (Mohamed Muizzu)के दिनों में भारत के साथ रिश्तों को लेकर सकारात्मक संकेत (Positive signs)देते नजर आए हैं लेकिन इसी बीच थिलाफुशी पोर्ट प्रोजेक्ट (Thilafushi Port Project) में चीन की बड़ी भूमिका ने एक बार फिर दोनों देशों के बीच मालदीव की रणनीति को चर्चा में ला दिया है। कुछ समय पहले ही मुइज्जू ने भारत की मदद से तैयार हो रहे थिलामाले ब्रिज को भारत और मालदीव के मजबूत रिश्तों का प्रतीक बताया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भारत सरकार के सहयोग के लिए आभार जताया था। लेकिन दूसरी तरफ मालदीव ने थिलाफुशी पोर्ट के पहले चरण का काम चीन की कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी यानी CHEC को सौंप दिया है।

थिलाफुशी कोई सामान्य इलाका नहीं है। राजधानी माले के पश्चिम में स्थित यह कृत्रिम द्वीप आने वाले समय में मालदीव के सबसे अहम कारोबारी और औद्योगिक केंद्रों में शामिल होने वाला है। सरकार माले के मौजूदा कमर्शियल पोर्ट पर बढ़ते दबाव और ट्रैफिक को कम करने के लिए बंदरगाह की गतिविधियों को थिलाफुशी ले जाने की योजना पर काम कर रही है। मालदीव सरकार के मुताबिक यहां आधुनिक वेयरहाउस कोल्ड स्टोरेज और माल ढुलाई से जुड़ी सुविधाओं के साथ एक बड़ा कमर्शियल पोर्ट विकसित किया जा रहा है।
योजना के पहले चरण में पोर्ट क्षेत्र को करीब 5 हेक्टेयर से बढ़ाकर 20 हेक्टेयर तक करने की बात है। इसमें 650 मीटर लंबी क्वे वॉल 125 मीटर का रोडसाइड जेट्टी बॉन्डेड वेयरहाउस और एक्स रे सुविधा जैसी व्यवस्थाएं शामिल होंगी। आधुनिक ऑटोमेटेड सिस्टम के जरिए माल की क्लीयरेंस प्रक्रिया को मौजूदा कई दिनों से घटाकर करीब 48 घंटे तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। यानी यह प्रोजेक्ट मालदीव की व्यापारिक व्यवस्था और सप्लाई चेन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस थिलाफुशी इलाके में चीन की कंपनी पोर्ट से जुड़ा काम करेगी वही इलाका भारत के ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट यानी GMCP का भी अहम हिस्सा है। भारत की ओर से करीब 400 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन और 100 मिलियन डॉलर की ग्रांट से तैयार हो रहे इस प्रोजेक्ट के जरिए माले को विलिमाले गुल्हिफाल्हु और थिलाफुशी से जोड़ा जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य केवल आवाजाही आसान करना नहीं बल्कि मालदीव की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना भी है।
यानी एक ही रणनीतिक क्षेत्र में भारत और चीन दोनों की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं मौजूद हैं। यही वजह है कि थिलाफुशी पोर्ट को लेकर चर्चा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। हिंद महासागर में मालदीव की भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है और किसी भी बड़े बंदरगाह प्रोजेक्ट में विदेशी कंपनी की भूमिका स्वाभाविक रूप से रणनीतिक सवाल खड़े करती है। हालांकि चीनी कंपनी को ठेका मिलने का मतलब यह अपने आप नहीं है कि यह बंदरगाह सैन्य इस्तेमाल के लिए होगा। लेकिन रणनीतिक विश्लेषकों की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि चीन को मालदीव के अहम समुद्री बुनियादी ढांचे में कितनी बड़ी भूमिका मिलती है।

मुइज्जू की  राजनीति को देखें तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है। वह 2023 में इंडिया आउट अभियान के जरिए सत्ता में आए थे और उनके कार्यकाल की शुरुआत में मालदीव को चीन के करीब जाता हुआ देखा गया था। लेकिन आर्थिक दबाव और वित्तीय जरूरतों के बीच भारत के साथ रिश्तों में फिर सुधार हुआ। अब मुइज्जू भारत की परियोजनाओं की तारीफ कर रहे हैं और साथ ही चीन के साथ बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट आगे बढ़ा रहे हैं।

ऐसे में इसे केवल भारत की अनदेखी या चीन के सामने पूरी तरह झुकाव कहना शायद जल्दबाजी होगी। ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि मालदीव दोनों बड़े देशों से अपने हित साधने की कोशिश कर रहा है। भारत उसे वित्तीय सहयोग कनेक्टिविटी और विकास परियोजनाओं में मदद दे रहा है जबकि चीन बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्माण प्रोजेक्ट में सक्रिय है। थिलाफुशी पोर्ट का फैसला यही बताता है कि माले फिलहाल भारत और चीन के बीच किसी एक पक्ष को चुनने के बजाय दोनों के साथ संबंध बनाए रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।

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