साहित्य

“गुरु की महिमा” -कविता (देवनारायण मल्लिक)

*गुरु की महिमा*

हैं गुरु ज्ञानाम्बर के भास्कर,

करते हैं अज्ञान तिमिर के भंजन,

अति बखान इनकी महिमा का

करते सब देवत्व लोक के नंदन।

 

तेरी सब उत्तम छवि देख,

कर जोड़ करते हैं वंदन अपार,

तेरी सुरत्व सम कर्मण्यता-से

शिष्यत्व को मिलता संबल हज़ार।

 

तू रत्नाकर! महा सलिल सुधा के

तुझमें है क्या थाह सीमित?

तू सुरेश! हो निखिल लोक के

जिस ओर मुड़ते, प्रकृति होती जागृत।

 

शिष्यत्व को करते हो नरोत्तम,

हर पल दृष्टि रख ज्ञानाचार,

राम-कृष्ण-सा नर रूप धरा पर,

समझा जग ने इन्हें ईश्वरावतार।

 

हैं नरेंद्र, परमहंस के परम तेज

विश्व मान चित्र पर वाणी किया बौछार,

रख सहेज गुरुवर की परम गुरुता,

किया बखान विशद वेदान्त सार।

 

तेरी प्रभा के दिव्य तेज निकट,

होते हैं जगदीश्वर पाणि जोड़ खड़े,

तू ज्ञान जगत के हो दिव्य उद्गम

आते भू पर पुरुषोत्तम बड़े-बड़े।

देवनारायण मल्लिक,                                          उच्च माध्यमिक शिक्षक , अंग्रेज़ी साहित्य

डी. पी. जी. सी. प्रोजेक्ट , बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय, कल्याणपुर चौक , समस्तीपुर, बिहार

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