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लाल साड़ी और वो खौफनाक चीख आज भी नहीं भूल पाए दर्शक ऐसे बना था लज्जा शंकर पांडे का आइकॉनिक सीन

डेस्क: हिंदी सिनेमा (Hindi Cinema)में कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के जेहन से नहीं निकलते। साल 1999 में रिलीज हुई फिल्म संघर्ष का (Lajja Shankar Pandey)लज्जा शंकर पांडे भी ऐसा ही किरदार था। आशुतोष राणा(Ashutosh Rana) ने इस भूमिका में ऐसा खौफ पैदा किया था कि उस दौर में सिनेमाघरों में बैठे दर्शक तक उनकी आवाज और हावभाव देखकर सहम जाते थे। आज फिल्म को रिलीज हुए कई साल बीत चुके हैं लेकिन लज्जा शंकर पांडे का नाम आते ही लोगों के सामने वही डरावना चेहरा और जीभ हिलाकर निकाली गई उनकी खौफनाक चीख याद आ जाती है।
इस किरदार की सबसे खास बात यह थी कि इसे डरावना बनाने के लिए किसी बड़े स्पेशल इफेक्ट या आधुनिक तकनीक का सहारा नहीं लिया गया था। आशुतोष राणा ने अपने अभिनय और आवाज के दम पर ऐसा माहौल तैयार किया जो आज भी याद किया जाता है। खास बात यह है कि जिस सीन को देखकर दर्शकों की चीख निकल जाती थी उसके लिए खुद आशुतोष राणा ने कोई रिहर्सल नहीं की थी।
फिल्म की कहानी महेश भट्ट ने लिखी थी और तनुजा चंद्रा ने इसका निर्देशन किया था। कहानी एक ऐसे खतरनाक तांत्रिक की थी जो अमर होने की सनक में बच्चों की बलि देता है। ऐसे किरदार के लिए सिर्फ संवाद बोलना काफी नहीं था। उसे पर्दे पर असामान्य और भयावह दिखाना जरूरी था। महेश भट्ट चाहते थे कि लज्जा शंकर पांडे की कोई ऐसी पहचान हो जिसे दर्शक लंबे समय तक भूल न पाएं।
यहीं से आशुतोष राणा की कल्पना ने इस किरदार को एक अलग पहचान दी। उन्होंने सोचा कि लज्जा शंकर आम इंसानों की तरह प्रतिक्रिया देने वाला व्यक्ति नहीं होना चाहिए। उसकी हर हरकत उसके भीतर की विकृत मानसिकता को दिखाए। इसी सोच के साथ उन्होंने जीभ हिलाते हुए एक अजीब और डरावनी चीख निकालने का अंदाज तैयार किया।
इस आवाज के पीछे उनके बचपन की यादों का भी बड़ा योगदान था। मध्य प्रदेश के गाडरवारा में बीता उनका बचपन उन्हें गांव की लोक परंपराओं और अनुष्ठानों के करीब लेकर गया था। उन्होंने वहां तांत्रिक और भगतों को अलग तरह की आवाजें निकालते हुए देखा था। रामलीला में रावण का किरदार निभाने का अनुभव और बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से मिली अभिनय की ट्रेनिंग ने भी उनके भीतर के कलाकार को मजबूत किया। इन्हीं अनुभवों को उन्होंने लज्जा शंकर पांडे की मानसिकता के साथ जोड़ दिया।

जब इस सीन की शूटिंग का समय आया तो आशुतोष राणा ने अपने इस प्रयोग को सीधे कैमरे के सामने करने का फैसला किया। कैमरा शुरू हुआ और उन्होंने अचानक जीभ हिलाते हुए वह खौफनाक चीख निकाल दी। सेट पर मौजूद लोगों के लिए यह पूरी तरह अप्रत्याशित था। कुछ पल के लिए वहां ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे हर कोई उस आवाज के असर में आ गया हो। कट होने के बाद भी टीम को कुछ क्षण समझ नहीं आया कि प्रतिक्रिया कैसे दी जाए। फिर सेट पर तालियों की गूंज सुनाई दी।

लज्जा शंकर पांडे के किरदार की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। उस समय आशुतोष राणा को खबर मिली थी कि यह भूमिका किसी बड़े स्टार को दी जा सकती है। वह दूसरी फिल्म की शूटिंग के लिए हैदराबाद में थे। खबर मिलते ही वह मुंबई पहुंचे और महेश भट्ट से मुलाकात की। बाद में उन्हें पता चला कि यह जानकारी गलत थी। महेश भट्ट ने साफ कर दिया कि लज्जा शंकर पांडे का किरदार आशुतोष राणा को ध्यान में रखकर ही लिखा गया था।
फिल्म रिलीज के समय भले ही बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई लेकिन समय के साथ संघर्ष को एक अलग पहचान मिली। टेलीविजन और बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए नई पीढ़ी ने भी फिल्म को देखा। आज लज्जा शंकर पांडे हिंदी सिनेमा के यादगार खलनायकों में गिना जाता है। आशुतोष राणा ने यह साबित कर दिया कि डर पैदा करने के लिए हमेशा तकनीक की जरूरत नहीं होती। कई बार एक कलाकार की आंखें उसकी आवाज और उसकी कल्पना ही दर्शकों की रीढ़ में सिहरन पैदा करने के लिए काफी होती है।

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