डेस्क:राजद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने मंगलवार को एनडीए सरकार पर बिहार में पुलिसिया अत्याचार बढ़ने और आरक्षण के मुद्दे पर पिछड़े, दलित एवं वंचित वर्गों के साथ न्याय नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बिहार को पुलिस राज्य बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे राजद किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा। पटना में आयोजित प्रेस वार्ता में तेजस्वी यादव ने वैशाली के एक पत्रकार का मामला उठाते हुए आरोप लगाया कि जनसमस्याओं और बदहाल सड़कों को लेकर सवाल उठाने के कारण उन्हें पुलिस प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। प्रेस वार्ता में उपस्थित पीड़ित पत्रकार ने आरोप लगाया कि 29 अगस्त की देर रात थाना प्रभारी राकेश कुमार पुलिस बल के साथ उनके घर पहुंचे और दरवाजा तोड़कर अंदर घुस गए। उन्होंने दावा किया कि पुलिस ने उन पर रिवाल्वर तान दी और उनकी मां, बहन तथा भाई के साथ अभद्रता और मारपीट की। इसके बाद उन्हें जबरन थाने ले जाया गया और रात में दूसरे थाने भेज दिया गया। पत्रकार के मुताबिक, अगले दिन सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने उन पर अलग-अलग मामलों में संलिप्तता स्वीकार करने का दबाव बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि हत्या के मामले में कबूलनामा कराने तथा उनके घर से देसी कट्टा और कारतूस बरामद होने की बात स्वीकार करने के लिए उन्हें बुरी तरह पीटा गया। उन्होंने किसी भी आरोप को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उन्होंने दावा किया कि बाद में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर अदालत में पेश किया गया, लेकिन गिरफ्तारी और बरामदगी से जुड़े पुलिस के साक्ष्यों पर सवाल उठे। अदालत ने उन्हें बंधपत्र पर रिहा करने का आदेश दिया।
तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि पूरी कार्रवाई स्थानीय विधायक और बिहार सरकार के मंत्री लखेंद्र पासवान के दबाव में की गई। उन्होंने कहा कि दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो राजद वैशाली बंद कराने के लिए मजबूर होगा। उन्होंने दरभंगा, गायघाट और सीतामढ़ी की घटनाओं का भी उल्लेख करते हुए पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए। प्रेस वार्ता के दूसरे हिस्से में तेजस्वी यादव ने आरक्षण का मुद्दा उठाते हुए एनडीए के सहयोगी दलों पर निशाना साधा।
उन्होंने कहा कि जीतन राम मांझी, चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जनता दल यूनाइटेड के नेता आरक्षण का राजनीतिक लाभ तो लेते हैं, लेकिन आरक्षण के संरक्षण और विस्तार के समय चुप्पी साध लेते हैं। तेजस्वी ने कहा कि महागठबंधन सरकार के दौरान जातीय गणना कराकर आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 75 प्रतिशत की गई थी और इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की गई थी, लेकिन केंद्र सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया।
उन्होंने मांग की कि यदि एनडीए के सहयोगी वास्तव में आरक्षण के पक्षधर हैं तो आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 85 प्रतिशत करने का नया कानून बनाया जाए और उसे नौवीं अनुसूची में शामिल कराया जाए। उन्होंने कहा कि देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों, उच्च न्यायालयों और केंद्र सरकार के मंत्रालयों में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है।
तेजस्वी ने कहा कि जब इन वर्गों की आबादी देश की बड़ी हिस्सेदारी है, तो शीर्ष संवैधानिक और प्रशासनिक पदों पर उनका प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों है। उन्होंने कहा कि जातीय गणना के आंकड़ों का वास्तविक औचित्य तभी है, जब उसके आधार पर भूमिहीन, गरीब, कमजोर और वंचित वर्गों के लिए ठोस नीतियां बनाई जाएं।
तेजस्वी ने कहा कि सामाजिक न्याय केवल चुनावी मुद्दा नहीं होना चाहिए। जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी के सिद्धांत के आधार पर आरक्षण और अवसरों का विस्तार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आरक्षण को लेकर दिखावटी और अवसरवादी राजनीति अब नहीं चलेगी।

