दरभंगा

लनामिवि के आदेश की खुलेआम अनदेखी, 23 दिन बाद भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे सेवानिवृत्त कर्मी

दरभंगा : ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (लनामिवि) के संबद्ध महाविद्यालयों में सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों के पद पर बने रहने का मामला अब विश्वविद्यालय की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। विश्वविद्यालय की ओर से स्पष्ट निर्देश जारी किए जाने के बावजूद कई संबद्ध कॉलेजों में सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, प्राध्यापक, प्रधान सहायक, किरानी और आदेशपाल के अब भी कार्यरत रहने की बात सामने आ रही है। इससे न केवल विश्वविद्यालय के आदेश के अनुपालन पर प्रश्नचिह्न लगा है, बल्कि संबद्ध कॉलेजों पर विश्वविद्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर भी चर्चा तेज हो गयी है।

मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक अगस्त को विश्वविद्यालय की ओर से सभी संबद्ध कॉलेजों को पत्र जारी कर सेवानिवृत्त शिक्षाकर्मियों को तत्काल सेवामुक्त करने का निर्देश दिया गया था। इतना ही नहीं, विश्वविद्यालय ने संबंधित कॉलेजों से आदेश के अनुपालन का प्रतिवेदन भी महज तीन दिनों के भीतर उपलब्ध कराने को कहा था। आदेश में यह स्पष्ट किया गया था कि जिन संबद्ध महाविद्यालयों में सेवानिवृत्त शिक्षाकर्मियों से कार्य लिया जा रहा है, उन्हें सेवामुक्त कर विश्वविद्यालय को इसकी जानकारी दी जाये। लेकिन निर्धारित समय सीमा बीतने के बाद भी अधिकांश कॉलेजों की ओर से विश्वविद्यालय को अनुपालन प्रतिवेदन उपलब्ध नहीं कराये जाने की बात सामने आ रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अब तक केवल एक कॉलेज ने विश्वविद्यालय को अनुपालन प्रतिवेदन भेजा है, जबकि अन्य संबद्ध महाविद्यालयों की ओर से इस संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी है। ऐसे में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि जब विश्वविद्यालय ने तीन दिनों की समय सीमा निर्धारित की थी, तो 23 दिन बीत जाने के बाद भी आदेश के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हो सकी?

 

सेवानिवृत्ति के बाद भी महत्वपूर्ण पदों पर बने रहने का आरोप: मामला केवल अनुपालन प्रतिवेदन तक सीमित नहीं है। जानकारी के अनुसार, शहर के दो संबद्ध कॉलेजों में सेवानिवृत्त प्रधानाचार्यों के अब भी पद पर बने रहने की बात सामने आयी है। वहीं, एक अन्य कॉलेज में दो प्राध्यापकों के सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनसे कार्य लिये जाने की जानकारी सामने आयी है। इसके अलावा कुछ कॉलेजों में सेवानिवृत्त शिक्षकेत्तर कर्मियों के भी कार्यरत रहने की बात कही जा रही है। इनमें किरानी और आदेशपाल जैसे पदों पर कार्य करने वाले कर्मी शामिल हैं। आरोप है कि सेवानिवृत्ति के बाद जहां संबंधित कर्मियों को नियमानुसार सेवामुक्त किया जाना चाहिए था, वहीं कुछ कॉलेज प्रबंधन की ओर से उन्हें काम करने की अनुमति दी जा रही है। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि संबद्ध एवं अंगीभूत डिग्री कॉलेजों में शिक्षकों तथा शिक्षकेत्तर कर्मियों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और सेवानिवृत्ति को लेकर विश्वविद्यालय के नियम एवं परिनियम निर्धारित हैं। ऐसे में यदि कोई कर्मी निर्धारित सेवानिवृत्ति के बाद भी पद पर बना हुआ है और उससे नियमित रूप से काम लिया जा रहा है, तो उसके पीछे प्रशासनिक अथवा प्रबंधकीय स्तर पर किस प्रकार की अनुमति है, यह अपने आप में जांच का विषय बन जाता है।

 

विश्वविद्यालय के आदेश के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं: सेवानिवृत्त कर्मियों से कार्य लिये जाने की शिकायतों के बाद कुलपति के आदेश पर विश्वविद्यालय की ओर से संबद्ध कॉलेजों को पत्र जारी किया गया था। पत्र में न केवल सेवानिवृत्त कर्मियों को सेवामुक्त करने का निर्देश दिया गया, बल्कि अनुपालन प्रतिवेदन भी मांगा गया था। साथ ही आदेश की अनदेखी करने वाले कॉलेजों के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गयी थी। अब जबकि विश्वविद्यालय की निर्धारित समय सीमा काफी पहले समाप्त हो चुकी है और अधिकांश कॉलेजों की ओर से अनुपालन प्रतिवेदन नहीं मिलने की बात सामने आ रही है, ऐसे में विश्वविद्यालय की अगली कार्रवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं। सवाल यह भी है कि विश्वविद्यालय ने जब स्वयं आदेश जारी कर उसकी समय सीमा तय की थी, तो अनुपालन नहीं करने वाले कॉलेजों से जवाब क्यों नहीं मांगा गया? यदि विश्वविद्यालय को यह जानकारी है कि कुछ कॉलेजों में सेवानिवृत्त कर्मी अब भी कार्य कर रहे हैं, तो उनके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई कब होगी? और यदि विश्वविद्यालय को ऐसी कोई जानकारी नहीं है, तो फिर संबद्ध कॉलेजों से मांगे गये अनुपालन प्रतिवेदन की निगरानी किस स्तर पर की जा रही है?

 

 

प्रधानाचार्य और प्रधान सहायक जैसे महत्वपूर्ण पद भी सवालों के घेरे में: शहर के कुछ संबद्ध कॉलेजों में सेवानिवृत्त कर्मियों के महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर बने रहने की बात सामने आने के बाद मामला और संवेदनशील हो गया है। जानकारी के अनुसार, कहीं प्रधानाचार्य तो कहीं प्रधान सहायक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर सेवानिवृत्त कर्मियों के बने रहने की चर्चा है। प्रधानाचार्य किसी भी कॉलेज के प्रशासनिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। वहीं प्रधान सहायक जैसे पद कॉलेज के दैनिक प्रशासनिक एवं कार्यालयी कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इन पदों पर सेवानिवृत्त कर्मियों के बने रहने की स्थिति केवल व्यक्तिगत सेवा-विस्तार का मामला नहीं रह जाती, बल्कि इससे कॉलेज के प्रशासनिक निर्णयों और विश्वविद्यालय के नियमों के अनुपालन पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। मामले को लेकर संबंधित कॉलेजों की प्रबंध समितियों के कुछ सदस्यों की ओर से कथित तौर पर यह कहा जा रहा है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी संबंधित कर्मियों को सेवामुक्त नहीं किया जायेगा। यदि ऐसा है, तो यह विश्वविद्यालय के स्पष्ट आदेश के साथ सीधे टकराव की स्थिति पैदा करता है।

 

 

कुलपति के आदेश का दावा कितना सही: इस पूरे प्रकरण में एक और दावा चर्चा में है। नियम विरुद्ध पद पर बने एक सेवानिवृत्त शिक्षाकर्मी की ओर से कथित रूप से यह दावा किया जा रहा है कि कुलपति के आदेश के आधार पर ही संबंधित प्रबंधन समिति ने उन्हें पद पर बनाए रखा है। यदि यह दावा सही है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है। क्योंकि एक ओर विश्वविद्यालय की ओर से सभी संबद्ध कॉलेजों को सेवानिवृत्त कर्मियों को सेवामुक्त करने का स्पष्ट निर्देश जारी किया गया है, वहीं दूसरी ओर किसी सेवानिवृत्त कर्मी को कुलपति के आदेश का हवाला देकर पद पर बनाए रखने की बात सामने आती है। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय के आदेशों और उनके क्रियान्वयन के बीच उत्पन्न इस विरोधाभास को स्पष्ट किया जाना आवश्यक हो जाता है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए इस संबंध में विश्वविद्यालय अथवा संबंधित कॉलेज प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष सामने आना बेहद महत्वपूर्ण है।

 

 

 

विश्वविद्यालय की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल: संबद्ध कॉलेजों के प्रशासनिक एवं वित्तीय मामलों में विश्वविद्यालय की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में जब विश्वविद्यालय स्वयं किसी विषय पर स्पष्ट आदेश जारी करता है और उसके अनुपालन के लिए समय सीमा निर्धारित करता है, तो उस आदेश के पालन की निगरानी भी विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी बनती है। यही वजह है कि 23 दिन बीतने के बाद भी अधिकांश कॉलेजों से अनुपालन प्रतिवेदन नहीं मिलने की स्थिति ने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिये हैं। यदि आदेश का पालन नहीं हुआ है, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि आदेश का पालन हो चुका है, तो अनुपालन प्रतिवेदन विश्वविद्यालय तक क्यों नहीं पहुंचा? इन दोनों परिस्थितियों में जवाबदेही तय होना जरूरी है। इसी बीच यह चर्चा भी सामने आ रही है कि कुछ संबद्ध कॉलेजों की प्रबंध समितियों में जनप्रतिनिधियों तथा विश्वविद्यालय की विभिन्न समितियों से जुड़े लोगों की मौजूदगी के कारण विश्वविद्यालय की कार्रवाई प्रभावित होती है। हालांकि, इस संबंध में सामने आये आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही इसे लेकर कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने आया है। इसलिए इस पहलू पर विश्वविद्यालय एवं संबंधित कॉलेज प्रबंधन का स्पष्ट पक्ष आवश्यक है।

 

 

 

फिलहाल पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि विश्वविद्यालय अपने ही आदेश के अनुपालन को लेकर आगे क्या कदम उठाता है। एक अगस्त को जारी आदेश में तीन दिनों के भीतर अनुपालन प्रतिवेदन मांगा गया था। लेकिन निर्धारित समय सीमा गुजरने के बाद भी यदि अधिकांश कॉलेजों से रिपोर्ट नहीं आयी है और सेवानिवृत्त कर्मियों के पद पर बने रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो विश्वविद्यालय के स्तर से स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी हो गया है। इस मामले में विश्वविद्यालय से जुड़े अधिकारी, संबद्ध कॉलेजों की प्रबंध समितियां और संबंधित कर्मी…सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। विश्वविद्यालय यदि अपने आदेश को प्रभावी ढंग से लागू कराता है तो इससे संबद्ध कॉलेजों में नियमों के अनुपालन का स्पष्ट संदेश जायेगा। वहीं यदि आदेश लंबित रहता है और कार्रवाई नहीं होती, तो विश्वविद्यालय की प्रशासनिक क्षमता तथा संबद्ध कॉलेजों पर उसके नियंत्रण को लेकर उठ रहे सवाल और गहरे हो सकते हैं। कॉलेज इंस्पेक्टर प्रो. अरुण कुमार सिंह से इस संबंध में उनका पक्ष जानने के लिए मोबाइल फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बातचीत नहीं हो सकी। विश्वविद्यालय अथवा संबंधित कॉलेजों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी रिपोर्ट में प्रमुखता से शामिल किया जायेगा।

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