विदेश से आने वाली फंडिंग… अब सिर्फ पैसों का मामला नहीं रहा! संसद में पेश हुआ नया कानून अब सीधे जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास पहुंच गया है।

मामला है विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA संशोधन विधेयक 2026 का।
12 अगस्त को लोकसभा ने इस विधेयक को 31 सदस्यों वाली संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेजने की मंजूरी दे दी।
अब सवाल है—इस विधेयक में ऐसा क्या है, जिस पर इतनी चर्चा हो रही है?
FCRA का मकसद भारत में आने वाले विदेशी चंदे और विदेशी आर्थिक सहायता को नियंत्रित और विनियमित करना है। इसके तहत गैर-सरकारी संगठनों और अन्य संस्थाओं को विदेशी धन प्राप्त करने और उसका इस्तेमाल करने के लिए नियमों का पालन करना पड़ता है।
प्रस्तावित संशोधन में एक अहम बदलाव विदेशी फंड से खरीदी या बनाई गई संपत्तियों से जुड़ा है।
अगर किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, वह अपना पंजीकरण खुद छोड़ देती है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो विदेशी अंशदान से बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन और निपटारे के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था प्रस्तावित है।
विधेयक में FCRA के उल्लंघन पर जुर्माने और कार्रवाई से जुड़े प्रावधानों में भी बदलाव का प्रस्ताव है।
सरकार का तर्क है कि इन बदलावों से विदेशी फंडिंग की निगरानी और कानून के अमल में ज्यादा स्पष्टता और बेहतर नियंत्रण आएगा।
वहीं विपक्ष की चिंता खास तौर पर इस बात को लेकर है कि सरकार को संस्थाओं की संपत्तियों और विदेशी फंड से जुड़े मामलों में कितनी शक्ति मिलनी चाहिए।
इसीलिए अब इस विधेयक की बारीकी से जांच संयुक्त संसदीय समिति करेगी और अपनी सिफारिशें देगी।
और सबसे जरूरी बात-अभी यह कानून लागू नहीं हुआ है। यह विधेयक फिलहाल संसदीय जांच के चरण में है।
तो विदेशी फंडिंग पर सरकार का नियंत्रण कितना बढ़ेगा और इसका असर गैर-सरकारी संगठनों पर कितना पड़ेगा? इसका जवाब अब संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट के बाद ही साफ होगा।

