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महाभारत से जुड़ी थी टाइम मशीन की कहानी करण जौहर की एक पेशकश के बाद ठंडे बस्ते में चली गई फिल्म

डेस्क: फिल्म निर्माता(Filmmaker) और लेखक करण राजदान(writer Karan Razdan) ने बॉलीवुड की सबसे चर्चित लेकिन अधूरी रह गई फिल्मों में शामिल टाइम मशीन(Time Machine) को लेकर बड़ा खुलासा किया है। यह फिल्म निर्देशक शेखर कपूर(Shekhar Kapur) के निर्देशन में बननी थी जिसमें आमिर खान और जूही चावला मुख्य भूमिकाओं में नजर आने वाले थे। विज्ञान कल्पना और भारतीय पौराणिक इतिहास को जोड़ने वाली इस फिल्म को उस दौर का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट माना जा रहा था लेकिन कई कारणों से यह फिल्म कभी पर्दे तक नहीं पहुंच सकी।
करण राजदान ने बताया कि टाइम मशीन की कहानी आमिर खान के किरदार पर आधारित थी जो गलती से एक ऐसी मशीन के जरिए अतीत में पहुंच जाता है जहां महाभारत का युद्ध चल रहा होता है। वहां उसकी मुलाकात भगवान कृष्ण से होती है और वह इतिहास के सबसे बड़े युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी बन जाता है। इस अनोखे विचार ने शुरुआत में पूरी टीम को बेहद उत्साहित कर दिया था।
उन्होंने बताया कि इस कहानी की प्रेरणा उन्हें और शेखर कपूर को अपने निजी जीवन की एक भावुक घटना से मिली थी। दोनों ने कम समय के अंतराल में अपने माता पिता को खो दिया था और अक्सर यह सोचते थे कि काश समय में पीछे जाकर उनसे एक बार फिर मिल पाते। इसी भावना ने टाइम मशीन की कहानी को जन्म दिया। केवल तीन महीने में पूरी कहानी पटकथा और संवाद तैयार कर लिए गए थे।
शेखर कपूर इस प्रोजेक्ट को लेकर इतने उत्साहित थे कि उन्होंने संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और गीतकार आनंद बख्शी को भी इससे जोड़ लिया था। आमिर खान परेश रावल और अन्य कलाकारों को भी कहानी सुनाई गई और सभी ने इसकी कल्पना और विषय की सराहना की। उस समय यह फिल्म भारतीय सिनेमा में तकनीकी और कहानी के स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकती थी।

करण राजदान ने यह भी खुलासा किया कि कई बड़े निर्माता इस फिल्म को बनाना चाहते थे। उन्होंने धर्मा प्रोडक्शंस के प्रमुख करण जौहर को भी स्क्रिप्ट भेजी थी लेकिन उन्हें स्क्रिप्ट के बदले केवल पच्चीस लाख रुपये की पेशकश की गई। राजदान के मुताबिक उन्हें लगा कि इतनी बड़ी और अनोखी कहानी की यह कीमत बेहद कम थी इसलिए बात आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में निर्माता फिरोज नाडियाडवाला ने भी इस प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करने की कोशिश की लेकिन निर्देशन को लेकर सहमति नहीं बन पाई। राजकुमार संतोषी का नाम भी सामने आया लेकिन राजदान का मानना था कि यह उनकी शैली की फिल्म नहीं थी।
आज जब भारतीय सिनेमा में विज्ञान कल्पना और पौराणिक कथाओं पर आधारित बड़े बजट की फिल्में बन रही हैं तब टाइम मशीन का अधूरा रह जाना एक बड़ी चूक माना जाता है। यदि यह फिल्म अपने समय में बन जाती तो संभव है कि भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में इसका नाम शामिल होता। वर्षों बाद सामने आए इन खुलासों ने एक बार फिर इस अधूरे ड्रीम प्रोजेक्ट को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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