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इतिहास और साहित्य का रिश्ता आत्मीय और जटिल : प्रो. कमलानंद झा

विश्वविद्यालय इतिहास विभाग द्वारा ‘इतिहास और साहित्य का अन्तर्संबंध’ विषयक एकल व्याख्यान आयोजित

दरभंगा : 90 के दशक में आयी इतिहास की एक नयी धारा नव्य इतिहास शास्त्र है जो साहित्य को इतिहास का दर्जा देता है। इतिहास सिर्फ राजा-महाराजाओं का ही नहीं, बल्कि ‘हिस्ट्री फ्रॉम बिलो’ अर्थात् जन-सामान्य का भी होना चाहिए। उक्त बातें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के प्राध्यापक प्रो. कमलानन्द झा ने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग द्वारा “इतिहास और साहित्य का अन्तर्संबंध” विषय पर आयोजित एकल व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में कही।

आगे उन्होंने औपनिवेशिक ऐतिहासिक दृष्टि की सीमाओं को बताते हुए साहित्य और साहित्य के इतिहास पर इसके प्रभावों और दुष्प्रभावों को विस्तार से बताया। इतिहास और साहित्य के रिश्ते को आत्मीय एवं जटिल बताते हुए उन्होंने कहा कि अधिकांश साहित्यकारों की ऐतिहासिक रचनाओं में कल्पना इतनी हावी हो जाती है कि वो न तो इतिहास रह पाता है और न ही बेहतर साहित्य ही बन पाता है। प्रो. झा ने हिन्दी साहित्य के इतिहास को अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंदों का इतिहास कहा। उन्होंने साहित्य और इतिहास के अन्तर्द्वन्दों पर समीक्षात्मक तथ्य रखते हुए विद्यापति की तीन रचनाओं- पुरुषपरीक्षा, लिखनावली एवं कीर्तिलता पर शोध-कार्य किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

अध्यक्षीय संबोधन में पीजी इतिहास के विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी ने कहा कि इतिहास एवं साहित्य में अन्योन्याश्रय संबंध होता है। इतिहास सत्य, तथ्य एवं स्रोतों पर आधारित होता है, जिसके लेखन में यद्यपि साहित्यिक स्रोत भी होते हैं, पर पुरातात्विक स्रोत अधिक प्रामाणिक होता है। कहा कि इतिहास नीरस होता है, पर साहित्य अपेक्षाकृत कल्पनाशील एवं अधिक सरस होता है।

विषय प्रवेश करते हुए संस्कृत-प्राध्यापक डॉ. आरएन चौरसिया ने कहा कि साहित्य और इतिहास एक-दूसरे के पूरक हैं। साहित्य समाज का दर्पण है, पर समाज किस ढांचे में ढल रहा है, यह इतिहास तय करता है। दोनों मानवीय ज्ञान एवं अभिव्यक्ति की दो धाराएं हैं जो अंततः जीवन के एक ही महासागर में जाकर मिलती हैं। कहा कि साहित्य का अध्ययन किए बिना किसी भी युग का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास नहीं लिखा जा सकता। इतिहास बताता है कि क्या हुआ, पर साहित्य बताता है कि क्या होना चाहिए?

समाजशास्त्र की प्राध्यापिका डॉ. लक्ष्मी कुमारी के संचालन में आयोजित व्याख्यान में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए संयोजक डॉ मनीष कुमार ने कहा कि इतिहासकार का काम एक न्यायाधीश की तरह होता है जो साक्ष्यों, शिलालेखों एवं दस्तावेजों के आधार पर तटस्थ होकर घटनाओं का विवरण देता है। उसकी प्रतिबद्धता तथ्यात्मक सत्य के प्रति होती है। वहीं साहित्यकार की प्रतिबद्धता भावात्मक सत्य के प्रति होती है। कहा कि इतिहास और साहित्य एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं और एक के बिना दूसरे का अस्तित्व अधूरा है। अतिथि स्वागत पाग एवं चादर से किया गया।

व्याख्यान में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार, राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी, गोयनका कॉलेज, सीतामढ़ी की इतिहास-प्राध्यापिका डॉ. बबीता कुमारी, जेएनयू, दिल्ली के पूर्व इतिहास-छात्र संजय कुमार, डॉ. सुशील कुमार सुमन, शोधार्थी- राजनाथ पंडित, शिवम कुमार झा, कंचन एवं वीणा सहित 60 से अधिक व्यक्ति उपस्थित थे।

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