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जन्मदिन विशेष: ‘कबीर सिंह’ के छोटे किरदार से ‘ग्लोरी’ के दमदार राका तक, कुणाल ठाकुर की खामोश लेकिन शानदार उड़ान

डेस्क:ऐसी इंडस्ट्री में जहां अक्सर रातों-रात मिली सफलता का जश्न मनाया जाता है, वहीं कुणाल ठाकुर का करियर एक अलग राह पर आगे बढ़ा है। उनका सफर सुर्खियां बटोरने वाले पलों से ज्यादा लगातार मेहनत, धैर्य और अपने अभिनय को बेहतर बनाने की कोशिशों से जुड़ा रहा है। जन्मदिन के खास मौके पर यह देखना दिलचस्प है कि कैसे एक्टर ने धीरे-धीरे अपनी एक अलग पहचान बनाई है और मुख्यधारा की फिल्मों में सहायक भूमिकाओं से आगे बढ़ते हुए मुख्य किरदार निभा रहे हैं। दर्शकों ने कुणाल ठाकुर को पहली बार सुपरहिट फिल्म ‘कबीर सिंह’ में नोटिस किया, और फिर इसके बाद वे नज़र आए एक और सुपरहिट फिल्म ‘एनिमल’ में। हालांकि इन दोनों ही फिल्मों में उनका किरदार सीमित होने के साथ-साथ कहानी के केंद्र से बाहर था, लेकिन इसके बावजूद न सिर्फ उन्होंने अपनी छाप छोड़ी, बल्कि दर्शकों को एक ऐसे कलाकार से परिचित कराया, जिसमें अपनी प्रतिभा दिखाने की क्षमता थी। हालांकि रातों-रात मिली पहचान के आसान रास्ते तलाशने के बजाय कुणाल ने ऐसे मौकों को चुना, जो उन्हें एक कलाकार के तौर पर खुद को चुनौती देने का अवसर देते थे। अपने हुनर को लगातार निखारने की उनकी यही चाह ‘ग्लोरी’ में साफ नजर आई। साल 2026 में रिलीज हुई नेटफ्लिक्स की स्पोर्ट्स-क्राइम ड्रामा में कुणाल ने बॉक्सर राका सिंह बेनीवाल का किरदार निभाया। इस भूमिका के लिए उन्हें जबरदस्त शारीरिक बदलाव से गुजरना पड़ा और महीनों तक बॉक्सिंग ट्रेनिंग व डायलॉग डिलीवरी पर मेहनत करनी पड़ी। सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने इस किरदार में एक ऐसे इंसान की भावनाओं को दिखाया, जो महत्वाकांक्षा, संघर्ष और अंदरूनी उलझनों से जूझ रहा है। उनका अभिनय इसलिए प्रभावशाली, लगा क्योंकि वह सिर्फ निभाया हुआ किरदार नहीं, बल्कि पूरी तरह जिया हुआ अनुभव महसूस हुआ।
कुणाल ठाकुर के सफर की सबसे दिलचस्प बात उनके प्रोजेक्ट्स के बीच नजर आने वाला बदलाव है। ‘ग्लोरी’ में दमदार और गंभीर राका का किरदार निभाने के बाद वह ‘हूज योर गायनेक?’ में बिल्कुल अलग अंदाज में नजर आए, जिसने उनकी बहुमुखी प्रतिभा को सामने रखा। यह दिखाता है कि कुणाल किसी एक किरदार में बंधने की बजाय अपने अभिनय के अलग-अलग पहलुओं को तलाशने में विश्वास रखते हैं।
जन्मदिन के मौके पर कुणाल ठाकुर का यह सफर हमें यह याद दिलाता है कि सिनेमा में बदलाव और पहचान हमेशा बड़े ऐलान के साथ नहीं आते। कई बार यह सफर धीरे-धीरे, एक किरदार के बाद दूसरे किरदार के जरिए तय होता है। ‘कबीर सिंह’ से ‘ग्लोरी’ तक कुणाल का सफर धैर्य, मेहनत, बदलाव को अपनाने की क्षमता और अपने हुनर पर भरोसे की कहानी है। अक्सर असली पहचान उन्हीं कलाकारों को मिलती है, जो लंबे समय तक बिना किसी शोर के अपने काम पर ध्यान देते रहते हैं।

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