डेस्क:पटना । जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने भारत की विदेश नीति, इंडो-पैसिफिक सहयोग, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूज़ीलैंड यात्रा और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक साझेदारी समेत विभिन्न मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ रहा है और भारत के लिए इस क्षेत्र के देशों के साथ मजबूत संबंध विकसित करना बेहद जरूरी है। जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया यात्रा से भारत को काफी लाभ मिला है और अब भारत तथा न्यूज़ीलैंड जैसे प्रमुख इंडो-पैसिफिक देश के बीच बातचीत और संभावित संयुक्त घोषणापत्र से कई सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच पारंपरिक रूप से अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन पिछले चार दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की न्यूज़ीलैंड यात्रा नहीं हुई थी। इसे संबंधों को नई दिशा देने वाला कदम बताया।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया है, जिनके साथ भारत के ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं और जहां व्यापार, रणनीति तथा आर्थिक सहयोग की बड़ी संभावनाएं हैं। इसका उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका को और मजबूत करना है।
असम के बजट को लेकर पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने कहा कि यह असम सरकार का अपना फैसला है। बिहार के संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य की एनडीए सरकार फिलहाल ऐसे किसी एजेंडे पर काम नहीं कर रही है और न ही इस तरह के किसी प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है।
बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी द्वारा उम्मीदवार बदलने के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि उम्मीदवार बदलने से उन्हें उम्मीद जरूर जगी होगी, लेकिन यह उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता को भी दर्शाता है।
उन्होंने दावा किया कि बांकीपुर भाजपा और एनडीए का मजबूत गढ़ है और वहां राजनीतिक पकड़ बनाना आसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि प्रशांत किशोर के सामने अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता बनाए रखने और चुनाव में अपनी स्थिति साबित करने की चुनौती है।
आतंकवाद के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इसके खिलाफ वैश्विक साझेदारी समय की जरूरत है। उनके अनुसार, कोई भी देश खुद को आतंकवाद के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं मान सकता। इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करके ही इस चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सकता है।

