कोलकाता | पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस वक्त नया मोड़ आ गया, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ तौर पर अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। उनके इस बयान के बाद राज्य में सियासी माहौल गरमा गया है और विपक्ष, खासकर बीजेपी, लगातार हमलावर हो गई है।
ममता बनर्जी ने कहा कि वह चुनाव में खुद को हारा हुआ नहीं मानतीं, इसलिए इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी पार्टी की कई सीटें गलत तरीके से छीनी गई हैं। इस बयान ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
इस मुद्दे पर वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने बेहद कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ममता के रुख को लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताते हुए कहा कि अगर कोई संवैधानिक मर्यादा का पालन नहीं करता, तो उसे पद पर बने रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि राज्यपाल को हस्तक्षेप करते हुए उन्हें पद से हटाना चाहिए।
वहीं, बीजेपी नेता दिलीप घोष ने भी तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सत्ता किसी की “पुश्तैनी संपत्ति” नहीं होती और हर पद की एक समय सीमा होती है। उन्होंने ममता बनर्जी को वास्तविकता स्वीकार करने की सलाह दी।
इस पूरे घटनाक्रम पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि देश किसी एक व्यक्ति की मनमर्जी से नहीं चलता और अगर कोई संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं करता, तो उसे हटाया जा सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराएगा, खासकर तब जब विधानसभा का कार्यकाल समाप्ति के करीब है। ऐसे में राज्यपाल की भूमिका और संवैधानिक प्रक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
फिलहाल, बंगाल की सियासत में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और यह मामला अब सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक बहस का विषय भी बनता जा रहा है।
आशुतोष झा

