डेस्क: अमेरिका की एक प्रमुख संसदीय समिति US House Appropriations Committee ने अपनी वित्तीय वर्ष 2027 की रिपोर्ट में नेपाल से तिब्बती शरणार्थियों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है। समिति ने अमेरिकी विदेश विभाग से कहा है कि वह नेपाल सरकार के साथ मिलकर इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाए। रिपोर्ट में खास तौर पर इस बात पर जोर दिया गया कि नेपाल में रह रहे कई तिब्बती शरणार्थियों को अब तक कानूनी पहचान नहीं मिल पाई है, क्योंकि 1995 के बाद उनका पंजीकरण बंद हो गया था। समिति ने सभी शरणार्थियों के पुनः पंजीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।
रिपोर्ट में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। कहा गया है कि चीन के प्रभाव के कारण नेपाल में तिब्बती समुदाय की स्थिति और कमजोर हो गई है। उनके धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर भी प्रतिबंध बढ़े हैं। अमेरिकी समिति ने यह भी सिफारिश की है कि नेपाल और भारत में तिब्बती शरणार्थियों के लिए चल रही सहायता योजनाओं के लिए फंडिंग पहले की तरह जारी रखी जाए। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में तिब्बत से जुड़े कार्यक्रमों के लिए लगभग 23 मिलियन डॉलर आवंटित किए गए थे, जबकि 2025 में 6.8 मिलियन डॉलर की सहायता बहाल की गई थी।
वित्तीय वर्ष 2027 के लिए समिति ने तिब्बत में सांस्कृतिक संरक्षण के लिए 10 मिलियन डॉलर और भारत-नेपाल में शरणार्थी सहायता के लिए 8 मिलियन डॉलर देने का प्रस्ताव रखा है। साथ ही नेपाल से यह भी कहा गया है कि वह UNHCR के नियमों का पालन करे, खासकर “नॉन-रिफाउलमेंट” सिद्धांत का, जिसके तहत किसी शरणार्थी को जबरन उस देश वापस नहीं भेजा जा सकता जहां उसे खतरा हो। कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट नेपाल में तिब्बती शरणार्थियों की स्थिति और चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता को उजागर करती है, और इस मुद्दे पर अमेरिका की सक्रिय भूमिका को भी दर्शाती है।

