आलेख

मई दिवस पर विशेष : मजदूरों का शोषण मानवता का उपहास (अशोक कुमार चौधरी)

पने मानवोचित अधिकारों की प्राप्ति के लिए श्रमिकों के संघर्ष की कहानी लंबी है। यह कहानी अब भी समाप्त नहीं हुई हैं। कब तक चलेगी, कहना कठिन है। आज का श्रमिक सामान्यत: सात-आठ घंटे काम करता है लेकिन पुराने जमाने में श्रमिक को पंद्रह-बीस घंटे तक काम करना पड़ता था और उसमें भी यदि मालिक उस श्रमिक के कार्य से संतुष्ट नहीं होता तो उसका वेतन काट लिया जाता था। कार्य की अवधि को आठ घंटे तक सीमित करने के लिए भी मजदूरों को कठोर संघर्ष करना पड़ा है। संघर्ष के उसी दौर में प्रथम मई का विशिष्ट महत्व रहा है। यह तारीख आज भी श्रमिकों के लिए प्रेरणा के स्रोत के रूप में काम करती है तथा इसके साथ जुड़ी घटना की स्मृति उनमें विद्युत-जैसा उत्साह उत्पन्ना करती है। इस घटना का केन्द्र था – अमेरिका का शिकागो शहर।

नीति की लड़ाई

उद्योगपतियों की नीतियों से बचने के लिए अमेरिका के मजदूरों ने अपनी एक संस्था बनाई थी – ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर’। इस संस्था ने अगस्त, १८६६ में यह माँग की थी कि मजदूरों के काम करने का अधिकतम समय आठ घंटे तय किया जाए। अमेरिका के श्रमिकों ने बार-बार अपनी इस माँग को दुहाराया लेकिन किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। लगातार २० वर्षों तक शांतिपूर्वक प्रतीक्षा करने के उपरांत श्रमिकों ने प्रथम मई, १८८६ को संघर्ष का बिगुल बजा दिया। संगठन ने श्रमिकों से हड़ताल का आह्वान किया और अमेरिका के श्रमिकों ने उसे सोत्साह समर्थन दिया। एक लाख नब्बे हजार मज़दूरों ने हड़ताल में सक्रिय रूप से भाग लिया तथा अमेरिका के विभिन्न भागों में मज़दूरों ने जो जुलूस निकाले, उनमें तीन लाख चालीस हजार मजदूर शामिल थे। हड़ताल का प्रमुख गढ़ था – शिकागो शहर, जहाँ ८० हज़ार मजदूरों ने हड़ताल में भाग लिया।

पुलिस और मजदूरों का संघर्ष

प्रथम मई से प्रारंभ होनेवाली यह हड़ताल बहुत प्रभावशाली ढंग से और शांतिपूर्वक चल रही थी। पुलिस चाहते हुए भी उसमें कुछ नहीं कर पा रही थीं। तीन मई को पुलिस अकारण ही मैकर्मिक हार्वेस्टर कारखाने में घुस गई और वहाँ शांति से प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर लाठी बरसाना शुरू कर दिया। छह मजदूर तत्काल शहीद हो गए तथा अन्य सैकड़ों मजदूर घायल हो गए। अगले दिन चार मई को जब मजदूर अपनी एक सभा कर रहे थे तो वहाँ किसी अज्ञात व्यक्ति के द्वारा एक बम विस्फोट किया गया, जिसमें पुलिस का एक सिपाही मारा गया। इसके तत्काल बाद पुलिस और मज़दूरों में झड़पें हो गईं, जिनमें चार मज़दूर तथा पुलिस के सात सिपाही मारे गए।

मजदूरों को मृत्युदंड

पुलिस ने अनेक मज़दूर नेताओं को गिरफ्तार किया तथा उनपर मुकदमे चलाए। इन मुकदमों के फलस्वरूप चार प्रमुख नेताओं को ११ नवम्बर, १८८७ को मृत्युदंड दिया गया। ये थे – स्पाइडर, फिशर, एंजेल तथा पारसन्स। अन्य अनेक नेताओं को लंबी अवधि के कारावास की सजा मिली। मृत्युदंड की सजा सुनाते समय न्यायाधीश श्री गैरी भी संभवत: अपने निर्णय पर क्षुब्ध अनुभव कर रहे थे। उस समय उनकी स्थिति के बारे में ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के संवाददाता ने लिखा था – ”मृत्युदंड का निर्णय सुनाते समय न्यायाधीश गैरी का चेहरा काँप रहा था और जुबान लड़खड़ा रही थी।”

संघर्ष विश्वव्यापी हुआ

अमेरिकी मजदूरों के इस संघर्ष ने विश्वभर के मजदूरों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया। इस घटना की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए १८८८ में ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर’ ने यह निर्णय लिया कि अमेरिका के सभी मजदूर प्रथम मई, १८९० को मजदूर दिवस के रूप में मनाएँगे तथा इसके उपरांत प्रतिवर्ष प्रथम मई को इसी प्रकार आयोजन किया जाता रहेगा। कार्ल मार्क्स की विचारधारा को व्यावहारिक स्वरूप देने की दृष्टि से जब १४ जुलाई, १८८९ को विश्वभर के समाजवादी, फ्रांस की राजधानी पेरिस में एकत्रित हुए तथा अंतराष्ट्रीय समाजवादी संगठन (सेकंड इंटरनेशनल) की स्थापना की, तब इस संस्था ने अपने एक प्रस्ताव में विश्वभर के मजदूरों के लिए कार्य की अधिकतम अवधि को आठ घंटे तक सीमित करने की माँग की। इसके अतिरिक्त इसमें यह भी प्रस्ताव पारित किया कि संपूर्ण विश्व में प्रथम मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाए।

प्रस्ताव-दिवस

इन प्रस्तावों के अनुसार प्रथम मई, १८९० को, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजदूर दिवस के रूप में मनाया गया। इस प्रथम मजदूर दिवस की चर्चा करते हुए एंजिल्स ने कार्ल मार्क्स की प्रसिद्ध पुस्तक ‘साम्यवादी घोषणा-पत्र’ की भूमिका में लिखा – ”आज जब मैं यह पंक्तियां लिख रहा हंू, उस समय यूरोप और अमेरिका के सर्वहारा एक झंडे के नीचे और एक सेना की शक्ल में अपनी ताकत तौल रहे हैं। आज के दिन का घटनाचक्र सभी पूंजीपतियों और भूस्वामियों की आंखें खोल देगा।”

रूस में पहला इतिहास

मई दिवस का आयोजन सभी देशों में एक साथ प्रथम मई, १८९० को प्रारंभ नहीं किया जा सका। कुछ देशों में इसका आयोजन बाद में प्रारंभ किया गया। इंग्लैंड में इसका प्रथम आयोजन ४ मई, १८९० को हुआ। इस आयोजन में कार्ल मार्क्स की पुत्री एलीनोर भी अपने पति के साथ उपस्थित हुई। रूस में १८९६ में मई दिवस का पहला इश्तहार लिखा गया। लिखनेवाले थे – ब्लाडीमीर इलियच उलियानोव लेनिन। उन्होंने इस इश्तहार को जेल में लिखा था।

चीन में मई दिवस का प्रथम आयोजन १९२४ में हुआ तथा स्वतंत्र वीएतनाम में मई दिवस पहली बार १९७५ में आयोजित किया गया।

भारत में मई दिवस

मजदूरों के इस विश्वव्यापी आंदोलन से भारत भी अछूता नहीं रह सका। देश के स्वाधीनता आंदोलन में मजदूरों की उल्लेखनीय भूमिका रही। हमारे यहाँ मई दिवस का प्रथम आयोजन १९२३ में हुआ। प्रथम मई को मद्रास के समुद्र तट पर आयोजित इस प्रथम मई दिवस के समारोह के अध्यक्ष मजदूर नेता श्री चेट्टीयार थे। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर और संगठित रूप में इसका आयोजन १९२८ में हुआ। उस समय से लेकर अब तक हमारे यहाँ मई दिवस का आयोजन प्रतिवर्ष बहुत उत्साह के साथ होता रहा है।

काम के घंटे

१९१९ में ‘अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन’ (आई.एल.ओ.) का प्रथम अधिवेशन हुआ। उसमें यह प्रस्ताव पारित किया गया कि सभी औद्योगिक संगठनों में कार्यावधि अधिक-से-अधिक आठ घंटे निर्धारित हो। श्रम संबंधी अन्य अनेक शर्तों को भी शब्दबद्ध किया गया। विश्व के अधिसंख्य देशों ने इन शर्तों को स्वीकार करके अपने यहाँ लागू भी कर दिया। १९३५ में इसी संगठन ने आठ घंटे की अवधि को घटाकर सात घंटे की अवधि का प्रस्ताव पारित किया। यह भी कहा गया कि एक सप्ताह में किसी भी मजदूर से ४० घंटे से अधिक काम नहीं लिया जाना चाहिए। विश्व के अनेक समाजवादी तथा अन्य विकसित देशों ने इस अवधि को और घटाकर सप्ताह में ३५ घंटे की अवधि को भी अपने यहाँ लागू किया है।

मजदूरों की सुख-सुविधा पर विचार-विमर्श के अतिरिक्त मई दिवस पर विभिन्न देशों में कुछ रोचक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए जाते हैं। तरह-तरह के गीत और नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं तथा मजदूरों की समस्या पर आधारित नाटक भी खेले जाते हैं। इंग्लैंड, चीन तथा जर्मनी आदि देशों में इस अवसर पर बच्चों के भी रंग-बिरंगे कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं।

लगभग एक सौ वर्षों के कठोर संघर्ष के बावजूद मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए अब भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। अनेक देशों में मजदूरों की आठ घंटे की कार्यावधि भी अब तक लागू नहीं हो पाई है। सप्ताह में ३५ घंटे की कार्यावधि तथा अन्य अनेक प्रकार की सुविधाएँ तो उनकी कल्पना से भी दूर हैं। उन्हें प्रतिदिन १२-१३ घंटे तक काम करना पड़ता है। अवकाश के दिनों का वेतन भी उन्हें नहीं मिलता है। जिन देशों में मजदूरों को कुछ सुख-सुविधाएँ दी गई हैं, वे भी केवल संगठित क्षेत्रों में कार्यरत मजदूरों के लिए हैं। असंगठित मजदूरों के लिए अब तक कोई विशेष उल्लेखनीय कार्य नहीं हो पाया है।

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