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पुण्यतिथि विशेष: आजादी के इन दीवानों को आज ही के दिन हुई थी फांसी

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Lucknow: स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी, प्रमुख सेनानी और काकोरी कांड के महानायक शहीद राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खॉ की आज 19 दिसम्बर 2019 को 92वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है। शहादत दिवस के मौके पर अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खान को पूर देश याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दी है।19 दिसम्बर 1927 को आजादी के इन दीवानों को गोरखपुर जेल में सवेरे साढ़े 6 बजे फांसी दी गई थी। इसी जेल में विस्मिल ने अपनी आत्मकथा भी लिखी थी। देश के कई क्रांतिकारियों के नाम जोड़े में लिए जाते हैं जैसे भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और राजगुरू। ऐसा ही एक और बहुत मशहूर जोड़ा है रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां का।

ऐसे बना काकोरी कांड का प्लान

उल्लेखनीय है कि साल 1922 के दौर में जब आजादी की लड़ाई चरम पर थी तब बंगाल में शचीन्द्रनाथ सान्याल व योगेश चन्द्र चटर्जी जैसे दो प्रमुख व्यक्तियों के गिरफ्तार हो जाने पर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का पूरा दारोमदार रामप्रसाद बिस्मिल के कन्धों पर आ गया। इसमें शाहजहाँपुर से प्रेम कृष्ण खन्ना, ठाकुर रोशन सिंह के अतिरिक्त अशफाक उल्ला खॉं का योगदान सराहनीय रहा। जब आयरलैण्ड के क्रान्तिकारियों की तर्ज पर जबरन धन छीनने की योजना बनायी गयी तो अशफाक ने अपने बड़े भाई रियासत उल्ला खां की लाइसेंसी बन्दूक और दो पेटी कारतूस बिस्मिल को उपलब्ध कराये ताकि धनाढ्य लोगों के घरों में डकैतियां डालकरपार्टी के लिये पैसा इकट्ठा किया जा सके।

किन्तु जब बिस्मिल ने सरकारी खजाना लूटने की योजना बनायी तो अशफाक ने अकेले ही कार्यकारिणी मीटिंग में इसका खुलकर विरोध किया। उनका तर्क था कि अभी यह कदम उठाना खतरे से खाली न होगा। सरकार हमें नेस्तनाबूद कर देगी। इस पर जब सब लोगों ने अशफाक के बजाय बिस्मिल पर खुल्लमखुल्ला यह फब्ती कसी कि पण्डित जी! देख ली इस मियाँ की करतूत। हमारी पार्टी में एक मुस्लिम को शामिल करने की जिद का असर अब आप ही भुगतिये, हम लोग तो चले।

इस पर अशफाक ने यह कहा कि पण्डित जी हमारे लीडर हैं हम उनके हम उनके बराबर नहीं हो सकते। उनका फैसला हमें मन्जूर है। हम आज कुछ नहीं कहेंगे लेकिन कल सारी दुनिया देखेगी कि एक पठान ने इस ऐक्शन को किस तरह अन्जाम दिया? और वही हुआ, अगले दिन 9 अगस्त 1925 की शाम काकोरी स्टेशन से जैसे ही ट्रेन आगे बढ़ी राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने चेन खींची, अशफाक ने ड्राइवर की कनपटी पर माउजर रखकर उसे अपने कब्जे में लिया और राम प्रसाद बिस्मिल ने गार्ड को जमीन पर औंधे मुंह लिटाते हुए खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। लोहे की मजबूत तिजोरी जब किसी से न टूटी तो अशफाक ने अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ाया और घन लेकर पूरी ताकत से तिजोरी पर टूट पडे। अशफाक के तिजोरी तोड़ते ही सभी ने उनकी फौलादी ताकत का नजारा देखा। वरना यदि तिजोरी कुछ देर और न टूटती और लखनऊ से पुलिस या आर्मी आ जाती तो मुकाबले में कई जाने जा सकती थीं। फिर उस काकोरी काण्ड को इतिहास में कोई दूसरा ही नाम दिया जाता।

इस मामले की सुनवाई के दौरान जज के सामने तमाम अपीलों व दलीलों का इतना असर हुआ कि फांसी की तारीख दो बार आगे बढ़ा दी गयी। पहली यह तारीख 16 सितम्बर 1927 थी, बाद में 11 अक्टूबर 1927 हुई। चूंकि लन्दन की प्रिवी-कौंसिल में मर्सी-अपील जा चुकी थी अत: फांसी की तारीख फिर से आगे के लिये टाल दी गयी। आखिरकार 19 दिसम्बर 1927 की तारीख मुकर्रर हुई और इसकी सूचना चारो जेलों को भेज दी गयी। फैजाबाद जेल में यह सूचना पहुँचते ही अशफाक ने 29 नवम्बर 1927 को अपने भाई रियासत उल्ला खॉं, 15 दिसम्बर 1927 को अपनी वालिदा मोहतरमा मजहूरुन्निशाँ बेगम तथा 16 दिसम्बर 1927 को अपनी मुँह बोली बहन नलिनी दीदी को खत लिखा और खुदा की इबादत में जुट गये।

बिस्मिल और अशफाक यूं शुरू हुई थी दोस्ती

अशफाक 22 अक्टूबर 1900 को यूनाइटेड प्रोविंस यानी आज के उत्तर प्रदेश के जिले शाहजहांपुर में पैदा हुए थे। अशफाक अपने चार भाइयों में सबसे छोटे थे। टीनएज में वे उभरते हुए शायर के तौर पर पहचाने जाते थे। और ‘हसरत’ के तखल्लुस यानी उपनाम से शायरी किया करते थे। पर घर में जब भी शायरी की बात चलती, उनके एक बड़े भाईजान अपने साथ पढ़ने वाले रामप्रसाद बिस्मिल का जिक्र करना नहीं भूलते। इस तरह से किस्से सुन-सुनकर अशफाक रामप्रसाद के फैन हो गए थे।

तभी राम प्रसाद बिस्मिल का नाम अंग्रेज सरकार के खिलाफ की गई एक साजिश में आया। इस केस का नाम पड़ा मैनपुरी कांस्पिरेसी। अशफाक भी अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने का सपना रखते थे। इस पर बिस्मिल से मिलने की अशफाक की इच्छा और बढ़ गई। अशफाक ने ठान लिया कि रामप्रसाद से मिलना है तो मिलना है। कहते हैं कि सच्चे मन से चाहकर कोशिश करने से कुछ भी पाया जा सकता है। यही हुआ। आखिर रामप्रसाद से अशफाक मिल ही गए।

उस वक्त हिंदुस्तान में गांधी जी का असहयोग आंदोलन अपने जोरों पर था। शाहजहांपुर में एक मीटिंग में भाषण देने बिस्मिल आए। अशफाक को ये पता चला तो मिलने पहुंच गए। जैसे ही प्रोग्राम ओवर हुआ अशफाक लपककर बिस्मिल से मिले और उनको अपना परिचय उनके एक दोस्त के छोटे भाई के रूप में दिया। फिर बताया कि मैं ‘वारसी’ और ‘हसरत’ के नाम से शायरी करता हूं। इस पर बिस्मिल का इंट्रेस्ट अशफाक में बढ़ा। बिस्मिल उनको अपने साथ ले आए और उनके कुछ शेर सुने, वे उनको पसंद आए। फिर दोनों साथ दिखने लगे। आस-पास के इलाके में बिस्मिल और अशफाक का जोड़ा फेमस हो गया। वो कहीं भी मुशायरों में जाते तो महफिल लूट कर आते।

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