साहित्य

कविता : प्रेम और बंधन (आशीष दीक्षित)

प्रिय आत्मन ! दो ही मार्ग हैं तुम्हारे लिये
यदि हो प्रेम में, तो अस्तित्व में पाओगी अभिनंदन
या तो प्रेम या फिर बन्धन

और अगर पाओ घृणा, अपमान व प्रवंचना
तो समझ लेना की पड़ गया गले एक बन्धन
प्रेम एक स्वतंत्रता है
जिसमें यदि हो तुम

जीवन-रथ का संचालन
तो अस्तित्व ही करेगा तुम्हारे                तो यही अस्तित्व करेगा             तुम्हारा उत्पीड़न

और यदि चुना तुमने बन्धन
जब तक चुनाव के ये दो रास्ते हैं सुदूर
तब तक तजो निज मन का गरूर
और भरो मन को बोध से ज्ञान से

फिर बंधनों का प्रवाह लांघो
जिसकी पहचान हेतु प्रशिक्षित है           तुम्हारा अवचेतन
और इसी बोध के सहारे सेतु बांधो
और फिर प्रेम के तट का स्पर्श साधो     प्रेम और बन्धन.

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