आलेख

जेपी जयंती विशेष : जनता के प्रति सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहते थे ‘जेपी’

विनय संकोची

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाजसेवी, राजनेता और आधुनिक भारत के अग्रणी विचारक जयप्रकाश नारायण के सामाजिक, राजनीतिक विचार आज भी प्रासंगिक हैं। लोकनायक के रूप में प्रसिद्ध जयप्रकाश नारायण यानी जेपी राजनीतिक दार्शनिक से अधिक सामाजिक दार्शनिक थे। 11 अक्टूबर 1902 को जन्मे जेपी ने गांधीवादी सहयोगी तथा गीता के दर्शन के अनुयाई के रूप में अपना जीवन प्रारंभ किया। अमेरिका में पढ़ते हुए पूर्वी यूरोप के बुद्धिजीवियों के संपर्क में आकर जेपी मार्क्सवादी बन गए।

लोकनायक के बेमिसाल राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा पहलू यह है कि उन्हें सत्ता का मोह नहीं था, शायद यही कारण है कि नेहरू की कोशिश के बावजूद वह उनके मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुए। वह सत्ता में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहते थे।

जेपी मार्क्सवादी होने के बाद भी रूसी क्रांति के समर्थक नहीं थे। जयप्रकाश नारायण भारतीय समाजवाद के प्रमुख प्रचारक और प्रवक्ता रहे। 1934 में भारतीय कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना में योगदान दिया और दल व उसके कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने में अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया। महान राष्ट्रीय संघर्षकर्ता के रूप में प्रख्यात जेपी हजारीबाग जेल से भाग निकले और स्वाधीनता संग्राम का संगठन किया। पुनः गिरफ्तार हुए और जेल में डाल दिए गए। 1 अप्रैल 1946 को मुक्त हुए।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद जयप्रकाश नारायण के राजनीतिक व्यक्तित्व में जबरदस्त परिवर्तन आया। उन्हें संस्थागत वह वाह्य परिवर्तनों की उपादेयता में संदेह होने लगा और वे आभ्यांतरिक परिवर्तन के सिद्धांत को मानने लगे, जिस पर महात्मा गांधी बल देते थे। 1954 में जयप्रकाश नारायण ने एक जीवन-दानी के रूप में स्वयं को सर्वोदय आंदोलन को समर्पित कर दिया। इससे पहले उन्होंने दलगत राजनीति से संन्यास ले लिया था।

जयप्रकाश नारायण को राजनीति के आर्थिक आधारों का स्पष्ट ज्ञान था। महात्मा गांधी जेपी को समाजवाद का सबसे बड़ा विद्वान मानते थे। समाजवादी होने के नाते जेपी ने इस बात को स्पष्ट किया कि सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में व्याप्त असमानता का मुख्य कारण यह है कि कुछ लोगों का उत्पादन के साधनों पर बहुत अधिक नियंत्रण है और बहुसंख्यक लोग उन से वंचित हैं। जेपी का आग्रह यह था कि समाज ऐसी व्यवस्था करे, जिससे मनुष्य की शक्ति और क्षमताओं को निष्फल करने वाली आर्थिक बाधाएं दूर हो सकें।

जेपी का स्पष्ट रूप से मानना था कि समाजवाद उन प्रमुख मान्यताओं के विरुद्ध नहीं है, जिनका भारतीय संस्कृति में पोषण किया। जेपी के अनुसार भारतीय संस्कृति में इस आदर्श को सर्वोपरि माना गया है कि व्यक्ति को निम्न कोटि की वासनाओं तथा परिग्रह की वृद्धि से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए। वस्तुओं का मिल बांटकर उपभोग करना भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श रहा है, इसलिए यह आरोप हास्यास्पद है कि समाजवाद का सिद्धांत पश्चिम से लिया गया है। जेपी चाहते थे कि गांवों को स्वायत्त तथा स्वाबलंबी इकाइयां बनाया जाए। इसके लिए भूमि संबंधी कानूनों में आमूल सुधार करने की आवश्यकता है। भूमि पर वास्तविक किसान का स्वामित्व होना चाहिए, जेपी ने सहकारी खेती का समर्थन भी किया।

जयप्रकाश नारायण का देश की तत्कालीन युवा पीढ़ी से उस समय वास्तविक परिचय हुआ, जब उन्होंने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए संपूर्ण क्रांति का विचार व नारा दिया था। बिहार से उठी समग्र क्रांति की चिंगारी देश के कोने कोने में आग बनकर भड़की थी और देखते ही देखते जेपी घर-घर में क्रांति का पर्याय बन गए थे।

समग्र क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण को गुरु मानकर तमाम नेताओं ने मुख्यमंत्री पद तक की यात्रा की। उस समय लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, जॉर्ज फर्नांडीस, सुशील कुमार मोदी आदि सब के सब जेपी के शिष्य माने जाते थे। लेकिन सत्ता के लालच में लगभग इन सभी ने जेपी की विचारधारा को तिलांजलि दे दी और खुद को उससे दूर कर लिया।

देश की सबसे ताकतवर महिला इंदिरा गांधी से न केवल जेपी ने लोहा लिया, अपितु उनके शासन को झकझोर कर रख दिया। लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि आज जयप्रकाश नारायण ज्यादा चर्चा में नहीं हैं। यह सर्वविदित है कि यदि जयप्रकाश नारायण ने समग्र क्रांति का बिगुल नहीं बजाया होता तो आज सत्ता सुख भोग रही भारतीय जनता पार्टी का कोई भविष्य नहीं होता।

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