साहित्य

हास्य-व्यंग्य : चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से (नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान)

ज सुबह हवा में मानो बर्फ बह रही थी। ठंड से हड्डियां कंपकंपा रही थीं। साथ ही, घना कोहरा था। दस मीटर के आगे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। सड़क पूरी तरह से नहाई हुई थी। पेड़-पौधों से बराबर पानी टपक रहा था। मैं बड़ी हिम्मत करके खुले आसमान के नीचे बने प्रपंच चबूतरे पर पहुंचा। वहां पूरी तरह सन्नाटा था। तभी सामने से चतुरी चाचा की कड़क आवाज आई- रिपोर्टर, बंगले मा आव। मैं चतुरी चाचा के बंगले (घर के सहन में फूस से बना छप्पर) में पहुंच गया। चारों तरफ कुछ दूरी पर कुर्सियां पड़ी थीं। बीच में तपता दहक रहा था। चतुरी चाचा कम्बल ओढ़कर तख्त पर पालथी मारे बैठे थे। मैंने सबसे पहले तपते में हाथ-पैर खूब सेंके। फिर एक कुर्सी पकड़ ली।
मेरे बैठते ही पच्छे टोला से कासिम चचा व मुंशीजी आ गए। वो दोनों भी ठिठुर रहे थे। दोनों जन अलाव तापने लगे। चतुरी चाचा बातचीत का सिलसिला शुरू करने वाले थे। तभी बड़के दद्दा भी पधार गए। वह आज स्पोर्ट शूज व ट्रैक सूट पहने थे। जब सब कुर्सियों पर विराजमान हो गए। तब चतुरी चाचा ने बड़के दद्दा से पूछा- का हो बड़के। ककुवा आजु कहाँ रहिगे? बड़के दद्दा ने बताया कि ककुवा कल शाम से बीमार हैं। वह डबल रजाई ओढ़े लेटे हैं। उनके जुकाम-बुखार है। रात में खूब उल्टी-दस्त भी हुए हैं। अभी डॉक्टर घर आये थे। उन्होंने बताया कि ककुवा को ठंड लग गयी है। इनको दवाएं खाने के बाद राहत मिल जाएगी। कोई चिंता मत करिए। बस ठंड से बचाकर रखिए।
चतुरी चाचा बोले- ककुवा ते बिपफै (गुरुवार) का कहा रहय कि खेती केरे पीछे जान न देव। मुदा उई हमार बाति मानिन नाय। ई भीषण ठंड मा उई मजूरन (मजदूरों) साथ सबेरे ते सांझ तलक ख्यातन मा जुटे रहे। ककुवा अपने गेंहू अउ आलू तौ सींचि डारिन। मुला बीमार परिगे। ई बखत ठंड ते जो मुरचा लेई, उई बीमार तौ होइबै करि। मुंशीजी ने कहा- चतुरी चाचा सही कह रहे हैं। हमारे मोहल्ले में भी तीन जने सर्दी-जुकाम और उल्टी-दस्त से पीड़ित हैं। आजकल जरा सी असावधानी बरती तो ठंड लगना पक्का है। बच्चों और बुजुर्गों को ठंड से बचाना बहुत जरूरी है। वैसे ठंड से पशु-पक्षी भी पीड़ित होते हैं। हर साल ठंड से न जाने कितने जीव बैमौत मरते हैं। खैर, प्रपंच निबटाने के बाद सब लोग ककुवा को देखने चला जायेगा।
इसी दौरान चंदू बिटिया गुनगुना नींबू पानी व अदरक-तुलसी वाली गुड़ की चाय लेकर आ गई। हम सबने गुनगुना पानी पीकर चाय के कुल्हड़ उठा लिये। चंदू बिटिया खाली ट्रे लेकर फुर्र हो गयी। चाय के साथ बतकही आगे बढ़ी। कासिम चचा ने कहा- हमारे गांवों में भी अब रूम हीटर, ब्लोअर का चलन बढ़ता जा रहा है। इससे यहां के लोग भी शहर की तरह एकाकी होते जा रहे हैं। हर शख्स अपने रूम में…कम्बल में…हीटर…ब्लोअर की आँच में सिमटने लगा है। गांव में मोहल्ले-मोहल्ले जलने वाले तपते नदारद हैं। अभी कुछ साल पहले तक हमारे गांवों में अलग-अलग स्थानों पर तपता/कोइरा जलता था। सुबह-शाम मोहल्ले के लोग एक जगह बैठकर लकड़ी की आग से शरीर को सेंकते थे। साथ ही, एक दूसरे के हालचाल लेते थे। गांव-जवार ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया की बातें होती थीं। सर्दी के सीजन में अनेक बार इसी तपते में आलू और शकरकंद भी भुनी खाई जाती थी।
चतुरी चाचा ने कासिम चचा की बात पर मोहर लगाते हुए कहा- सही बात है। अब गाँवों में भी शहर जैसा हाल हो गया है। लोग अपने ‘मियां-बीवी-बच्चे’ वाले परिवार में सीमित होते जा रहे हैं। वहीं, चारों तरफ कंक्रीट का जंगल बाहें पसार रहा है। हरियाली पर आरा चल रहा है। बागें कटती जा रही हैं। जंगलों का विनाश होता जा रहा है। अब गांव में भी न लकड़ी है, न अलाव है और न वह आपसी प्यार बचा है। अब तो सरकार शहर और देहात में कुछ स्थानों पर लकड़ी भेजकर अलाव जलवाने की रस्म अदा करती है। हम जैसे ही कुछ लोग बचे हैं, जो अपनी बाग की सूखी लकड़ी जाड़े भर जलाकर तापते हैं। बाकी भोजन बनाने के लिए लकड़ी मिल नहीं रही है। इस महंगाई में तपता कौन जला पायेगा?
बड़के दद्दा ने विषय परिवर्तन करते हुए कहा- नए कृषि कानून को लेकर विपक्ष से समर्थन प्राप्त किसानों और केंद्र सरकार के बीच रस्साकसी जारी है। पिछले 25 दिनों से दोनों पक्ष अपनी बात पर अड़े हैं। किसान दिल्ली की सीमा पर डटे हैं। वहीं, मोदी सरकार किसानों को बातचीत के लिए बराबर बुला रही है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बनाने का आदेश दे दिया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसान और सरकार के प्रतिनिधियों वाली यह कमेटी मुद्दे का हल खोज लें। प्रधानमंत्री सहित केंद्र के सभी कद्दावर मंत्री और भाजपा के नेता किसानों को नए कृषि कानून की अच्छाइयां समझाने में दिन रात एक किये हैं। परंतु, किसान संगठन और विपक्षी पार्टियां तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने पर अड़ी हैं।
अंत में चतुरी चाचा ने मुझसे कोरोना अपडेट देने को कहा। हमने बताया कि विश्व में अबतक साढ़े सात करोड़ से अधिक लोग कोरोना से पीड़ित हो चुके हैं। वहीं, कोरोना से 16 लाख 64 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इसी तरह भारत में कोरोना पीड़ितों की संख्या एक करोड़ से अधिक हो गयी है। यहाँ अबतक एक लाख 45 हजार से अधिक लोगों को कोरोना निगल चुका है। हालांकि, अपने देश में रिकवरी रेट बड़ा शानदार है। देश में इस समय 24 घण्टे में 25 हजार से ज्यादा नए मरीज मिल रहे हैं। बहरहाल, कई देशों में कोरोना की वैक्सीन लगने लगी है। भारत में भी कोरोना का टीका लगाए जाने की तैयारी युद्ध स्तर पर चल रही है।
इसी के साथ आज का प्रपंच समाप्त हो गया। मैं अगले रविवार को एक फिर चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे पर होने वाले प्रपंच को लेकर हाजिर रहूँगा। तबतक के लिए पँचव राम-राम!

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