आलेख

कविता : मुंशी प्रेमचंद जी की एक सुंदर कविता (दीपा अग्रवाल) जिसके एक-एक शब्द को बार-बार पढ़ने को मन करता है……

 बेगूसराय   से  :- 
_ख्वाहिश नहीं मुझे_
_मशहूर होने की,”_
        _आप मुझे पहचानते हो_
        _बस इतना ही काफी है।_
_अच्छे ने अच्छा और_
_बुरे ने बुरा जाना मुझे,_
        _जिसकी जितनी जरूरत थी_
        _उसने उतना ही पहचाना मुझे!_
_जिन्दगी का फलसफा भी_
_कितना अजीब है,_
        _शामें कटती नहीं और_
        _साल गुजरते चले जा रहे हैं!_
_एक अजीब सी_
_’दौड़’ है ये जिन्दगी,_
        _जीत जाओ तो कई_
        _अपने पीछे छूट जाते हैं और_
_हार जाओ तो_
_अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं!_
_बैठ जाता हूँ_
_मिट्टी पे अक्सर,_
        _मुझे अपनी_
        _औकात अच्छी लगती है।_
_मैंने समंदर से_
_सीखा है जीने का तरीका,_
        _चुपचाप से बहना और_
        _अपनी मौज में रहना।_
_ऐसा नहीं कि मुझमें_
_कोई ऐब नहीं है,_
        _पर सच कहता हूँ_
        _मुझमें कोई फरेब नहीं है।_
_जल जाते हैं मेरे अंदाज से_
_मेरे दुश्मन,_
              _एक मुद्दत से मैंने_
       _न तो मोहब्बत बदली_
      _और न ही दोस्त बदले हैं।_
_एक घड़ी खरीदकर_
_हाथ में क्या बाँध ली,_
        _वक्त पीछे ही_
        _पड़ गया मेरे!_
_सोचा था घर बनाकर_
_बैठूँगा सुकून से,_
        _पर घर की जरूरतों ने_
        _मुसाफिर बना डाला मुझे!_
_सुकून की बात मत कर_
_ऐ गालिब,_
        _बचपन वाला इतवार_
        _अब नहीं आता!_
_जीवन की भागदौड़ में_
_क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?_
        _हँसती-खेलती जिन्दगी भी_
        _आम हो जाती है!_
_एक सबेरा था_
_जब हँसकर उठते थे हम,_
        _और आज कई बार बिना मुस्कुराए_
        _ही शाम हो जाती है!_
_कितने दूर निकल गए_
_रिश्तों को निभाते-निभाते,_
        _खुद को खो दिया हमने_
        _अपनों को पाते-पाते।_
_लोग कहते हैं_
_हम मुस्कुराते बहुत हैं,_
        _और हम थक गए_
        _दर्द छुपाते-छुपाते!_
_खुश हूँ और सबको_
_खुश रखता हूँ,_
        _लापरवाह हूँ ख़ुद के लिए_
        _मगर सबकी परवाह करता हूँ।_
_मालूम है_
_कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी_
        _कुछ अनमोल लोगों से_
        _रिश्ते रखता हूँ।_
                               सामाजिक नेटवर्किंग सेवा पर प्रकाशित
                                 दीपा अग्रवाल के द्वारा (बेगूसराय)

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