साहित्य

कविता : गरीब की भूख….. (दिव्या सिंह)

दिव्या सिंह

( साथी वेलफेयर केयर सोसायटी)

 

गरीब की भूख

नयन हैं रुसवा , हृदय में थोड़ी-सी आस…
चीथड़ों में तन लिपटे हैं…
काँपे थरथर हाथ…
मान-सम्मान का कर के त्याग…
सकुचाते आए हाथ पसार…
क्या-क्या परिस्थिति में ला खड़ा करे…
गरीब की भूख की आग…
न मांगे ये छप्पन भोग किसी से…
न षद्रस भोजन का स्वाद….
लोगों के फेंके भोजन से भी मिट जाए…
गरीब की भूख की आग…
खूब सफलता पाई हमने…
खींच बड़ी दीवार…
फिर भी कुंठित सोच का…
नहीं हुआ विस्तार….
बाहरी चकाचौंध में हुई मानवता भी खाक…
फैले हाथों को दुत्कार कर कहे…
“आगे बढ़, मुझे कर माफ”…
आगे बढ़-बढ़कर , हुई सुबह से रात…
मुट्ठीभर भोजन की भी खत्म हुई आस…
शूल-सी अभी भी मन में चुभती एक ही बात…
क्या कल सवेरा होगा या होंगे यही हालात…
क्या फिर एक सूखी रोटी को तरसेगा मेरा लाल…
या आएगा कोई दिव्य पुरुष, चमकाने मेरे भाल…
स्वयं ही लेकर आएगा दो रोटी और साग…
हाँ , वही मानवता का प्रतीक मिटा जाएगा…
मुझ गरीब की भूख की आग…..

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